27 मार्च को नेपाल के प्रधानमंत्री का पद संभालने वाले बालेंद्र ‘बालेन’ शाह के शुरुआती 150 दिन उम्मीदों और विवादों से भरे रहे हैं। कभी अंडरग्राउंड रैपर, स्ट्रक्चरल इंजीनियर और काठमांडू के मेयर रहे शाह ने खुद को पारंपरिक राजनीति से अलग नेता के तौर पर स्थापित किया था। मार्च के चुनाव में उन्होंने चार बार प्रधानमंत्री रह चुके केपी शर्मा ओली को उनके गढ़ झापा में हराया और अपनी पार्टी राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी (RSP) को बहुमत दिलाने में अहम भूमिका निभाई।
शाह की जीत को नेपाल की राजनीति में पीढ़ीगत बदलाव के तौर पर देखा गया। जेन-जी मतदाताओं ने उन्हें जवाबदेही, ऊर्जा और पुराने राजनीतिक नेतृत्व के विकल्प के रूप में स्वीकार किया। लेकिन सत्ता संभालने के कुछ ही महीनों बाद उनकी लोकप्रियता पर सवाल उठने लगे और जुलाई में वही युवा वर्ग सड़कों पर उतरकर उनके इस्तीफे की मांग करने लगा।
शुरुआती फैसलों से बढ़ी नाराजगी
अप्रैल में शाह सरकार ने भारत से नेपाल की खुली सीमा के जरिए खरीदे जाने वाले सामान पर कस्टम नियम सख्त कर दिए। तय सीमा से अधिक कीमत के सामान पर टैक्स लगाए जाने से उन नेपाली नागरिकों में नाराजगी बढ़ी, जो दवाइयों, किराने और घरेलू जरूरतों के लिए भारतीय बाजारों पर निर्भर रहते हैं। बढ़ते विरोध के बाद सरकार को अपना फैसला वापस लेना पड़ा।
इसके बाद भारत से जुड़ा सीमा विवाद भी सामने आया। जून में शाह की पार्टी के चेयरमैन रबी लामिछाने के भारत दौरे और वहां राजनीतिक नेताओं के साथ उनकी मुलाकातों ने भी नेपाल की राजनीति में चर्चा पैदा की।
विदेशी राजनयिकों से मुलाकात को लेकर बदला रुख
बालेन शाह ने शुरुआत में मंत्री स्तर से नीचे के विदेशी राजनयिकों के साथ आमने-सामने मुलाकात करने से परहेज किया था। हालांकि, 10 अगस्त को उन्होंने यह रुख बदलते हुए काठमांडू के सिंह दरबार में भारतीय राजदूत नवीन श्रीवास्तव और चीनी राजदूत झांग माओमिंग से अलग-अलग मुलाकात की।
इस बदलाव को उनकी विदेश नीति में व्यावहारिक रुख अपनाने के संकेत के तौर पर देखा गया।
राइड-शेयर ड्राइवर की मौत से भी घिरी सरकार
जुलाई में बालेन प्रशासन की कार्यशैली को लेकर एक और विवाद सामने आया। म्युनिसिपल पुलिस के साथ विवाद के बाद राइड-शेयर ड्राइवर गणेश नेपाली ने खुद को आग लगा ली। इस घटना ने प्रशासन के तौर-तरीकों और आम नागरिकों के साथ उसके व्यवहार पर गंभीर सवाल खड़े किए।
इसी दौरान जमीन-विहीन लोगों और अनौपचारिक बस्तियों को हटाने की सरकारी कार्रवाई का भी विरोध हुआ। प्रदर्शनकारियों का आरोप था कि लोगों को पर्याप्त पुनर्वास दिए बिना हटाया जा रहा है।
सांप्रदायिक हिंसा ने बढ़ाई चुनौती
जुलाई के अंतिम सप्ताह में भारत की सीमा से लगे नेपाल के दक्षिणी जिलों में हिंदू और मुस्लिम समूहों के बीच सांप्रदायिक झड़पें हुईं। इन घटनाओं में तीन लोगों की मौत हुई। प्रधानमंत्री बनने के बाद यह शाह के सामने आए सबसे गंभीर सार्वजनिक संकटों में से एक था और उन्हें इस मुद्दे पर अपना पहला बड़ा सार्वजनिक भाषण देना पड़ा।
पार्टी और संसद से दूरी भी सवालों में
बालेन शाह के शासन को लेकर सबसे बड़ी चिंता सिर्फ सड़कों पर होने वाले विरोध से नहीं, बल्कि संस्थागत स्तर पर बढ़ती दूरी से जुड़ी है। संसद और यहां तक कि अपनी ही पार्टी के साथ उनके संबंधों को लेकर सवाल उठ रहे हैं। इससे यह चर्चा तेज हुई है कि जिस राजनीतिक गठबंधन और जनसमर्थन ने उन्हें सत्ता तक पहुंचाया था, क्या वह अब कमजोर पड़ रहा है।
150 दिनों का सफर बताता है कि बालेन शाह के सामने सबसे बड़ी चुनौती केवल पुराने राजनीतिक नेतृत्व को बदलना नहीं, बल्कि उस व्यवस्था को प्रभावी ढंग से चलाना है जिसे बदलने के वादे के साथ वे सत्ता में आए थे। जेन-जी की उम्मीदों पर खरा उतरना और संस्थागत राजनीति के साथ संतुलन बनाना अब उनके राजनीतिक भविष्य की सबसे बड़ी परीक्षा बन गया है।
