रायपुर। साल 2025 छत्तीसगढ़ के इतिहास में एक ऐसा वर्ष बनकर दर्ज हुआ, जिसने राज्य को सांस्कृतिक, साहित्यिक, राजनीतिक और पत्रकारिता जगत की कई अनमोल विभूतियों से वंचित कर दिया। यह वर्ष केवल घटनाओं का नहीं, बल्कि उन व्यक्तित्वों की विदाई का साक्षी बना, जिन्होंने अपने शब्दों, सुरों, विचारों और कर्मों से समाज को दिशा दी, संवेदना जगाई और पहचान गढ़ी।
हास्य और विचार की दुनिया से पद्मश्री डॉ. सुरेंद्र दुबे, साहित्य से ज्ञानपीठ सम्मानित विनोद कुमार शुक्ल, संगीत व सिनेमा से अभिनेत्री-गायिका सुलक्षणा पंडित, राजनीति से सुभाष धुप्पड़ और पत्रकारिता से मुकेश चंद्राकर—इन सभी का जाना छत्तीसगढ़ की आत्मा में गहरी रिक्तता छोड़ गया।
पद्मश्री हास्य कवि डॉ. सुरेंद्र दुबे (1953–2025)
बेमेतरा में जन्मे डॉ. सुरेंद्र दुबे केवल एक हास्य कवि नहीं, बल्कि समाज को मुस्कुराते हुए आईना दिखाने वाले रचनाकार थे। आयुर्वेदिक चिकित्सक होने के साथ-साथ उन्होंने कविता को जन-जन तक पहुंचाया। 26 जून 2025 को उनके निधन के साथ मंचों से गूंजने वाली वह ठहाकों भरी आवाज हमेशा के लिए खामोश हो गई। हास्य के माध्यम से गंभीर सवाल उठाने वाले डॉ. दुबे छत्तीसगढ़ी और हिंदी साहित्य की अमिट पहचान थे।

साहित्यकार विनोद कुमार शुक्ल (1937–2025)
23 दिसंबर 2025 को ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित लेखक विनोद कुमार शुक्ल का निधन हुआ। वे छत्तीसगढ़ के पहले साहित्यकार थे जिन्हें यह सर्वोच्च सम्मान मिला। “नौकर की कमीज” और “दीवार में एक खिड़की रहती थी” जैसी रचनाओं में उन्होंने साधारण मनुष्य के असाधारण जीवन को बेहद सरल, लेकिन गहन भाषा में प्रस्तुत किया। उनका जाना छत्तीसगढ़ की साहित्यिक चेतना के लिए एक अपूरणीय क्षति बन गया।

अभिनेत्री व गायिका सुलक्षणा पंडित (1954–2025)
6 नवंबर 2025 को सुलक्षणा पंडित ने दुनिया को अलविदा कहा। रायगढ़ से जुड़ी इस कलाकार ने 70–80 के दशक में सिनेमा और संगीत दोनों में अपनी अलग पहचान बनाई। “तू ही सागर है, तू ही किनारा” जैसे गीत आज भी भावनाओं को छू जाते हैं। फिल्मफेयर पुरस्कार से सम्मानित सुलक्षणा पंडित की सादगी, संवेदनशील अभिनय और संगीत के प्रति समर्पण उन्हें हमेशा यादगार बनाए रखेगा।

कांग्रेस नेता सुभाष धुप्पड़
रायपुर की राजनीति में सुभाष धुप्पड़ एक ऐसे नेता थे, जिनकी पहचान पद से अधिक उनके काम और कार्यकर्ताओं से सीधे जुड़ाव से थी। रायपुर विकास प्राधिकरण के अध्यक्ष रहते हुए उन्होंने शहर के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। 2025 में उनका निधन राजनीति से परे एक संवेदनशील और जमीनी नेता के जाने का दुख बन गया।

पत्रकार मुकेश चंद्राकर (1991–2025)
साल 2025 की शुरुआत में छत्तीसगढ़ ने एक निर्भीक युवा पत्रकार मुकेश चंद्राकर को खो दिया। वे उन पत्रकारों में थे, जो सत्ता और व्यवस्था से सवाल पूछने से नहीं हिचकते थे। भ्रष्टाचार, प्रशासनिक लापरवाही और ज़मीनी सच्चाइयों को उजागर करने वाली उनकी रिपोर्टिंग ने उन्हें अलग पहचान दी। उनका असमय जाना सच की राह पर चलने की कीमत और जोखिम की याद दिला गया।

यादों में जीवित रहेंगे ये नाम
साल 2025 छत्तीसगढ़ के लिए एक भावुक अध्याय बन गया। ये सभी हस्तियां भले ही अब हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन उनकी रचनाएं, विचार, संघर्ष और योगदान इतिहास के पन्नों में ही नहीं, लोगों के दिलों में हमेशा जीवित रहेंगे।
