अमेरिका और इजराइल ने ईरान के खिलाफ सैन्य कार्रवाई करते समय वहां की मौजूदा सत्ता व्यवस्था को कमजोर कर सत्ता परिवर्तन की उम्मीद जताई थी। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और इजराइल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू लगातार ईरान में इस्लामिक शासन को खत्म करने की बात कर रहे थे। फरवरी 2026 के आखिर में शुरू हुए हमलों और करीब 40 दिनों तक चले युद्ध के बावजूद ईरान की राजनीतिक व्यवस्था में कोई बड़ा बदलाव नहीं हो सका। इसके उलट, युद्ध की कीमत और आर्थिक दबाव को लेकर अमेरिका और इजराइल की घरेलू राजनीति में दोनों नेताओं को मुश्किलों का सामना करना पड़ रहा है।
ईरान में नेतृत्व बदला, लेकिन व्यवस्था कायम रही
ईरान के सर्वोच्च नेता अयातुल्लाह अली खामेनेई की मौत के बाद भी वहां की शासन व्यवस्था नहीं डगमगाई। इसकी बड़ी वजह ईरान की राजनीतिक और सुरक्षा व्यवस्था का व्यापक ढांचा माना जा रहा है। ईरान में सत्ता का आधार केवल सर्वोच्च नेता तक सीमित नहीं है, बल्कि धार्मिक संस्थाओं, सुरक्षा बलों और इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स (IRGC) जैसे प्रभावशाली संगठनों का मजबूत नेटवर्क भी इसमें अहम भूमिका निभाता है।
यही कारण है कि शीर्ष नेतृत्व को निशाना बनाए जाने के बावजूद ईरान की पूरी व्यवस्था को बदलना आसान साबित नहीं हुआ। ट्रंप और नेतन्याहू की उम्मीद थी कि सैन्य दबाव और नेतृत्व के खात्मे से ईरान में सत्ता परिवर्तन का रास्ता खुल सकता है, लेकिन ऐसा नहीं हुआ।
ईरान के खिलाफ जंग का असर अमेरिका की राजनीति पर
जनवरी 2026 में ईरान में महंगाई और आर्थिक संकट के खिलाफ हुए प्रदर्शनों को ट्रंप प्रशासन ने सत्ता परिवर्तन के संभावित अवसर के रूप में देखा था। रिपोर्ट के मुताबिक, अमेरिकी सरकार ने प्रदर्शनकारियों की मदद के लिए ईरानी अधिकारियों को निशाना बनाने जैसे विकल्पों पर भी विचार किया था। बाद में अमेरिका और इजराइल ने ईरान के खिलाफ सैन्य कार्रवाई की।
हालांकि, युद्ध के बाद अमेरिका में भी इस फैसले को लेकर सवाल उठने लगे। अमेरिकी नागरिकों के बीच महंगाई, आर्थिक दबाव और देश को युद्ध में झोंकने को लेकर नाराजगी सामने आई। इसी असंतोष का असर चुनावी नतीजों में दिखाई देने का दावा किया जा रहा है। ईरान ने भी अमेरिकी चुनावी नतीजों को युद्ध के खिलाफ जनता की प्रतिक्रिया बताया है।
इजराइल में नेतन्याहू के सामने भी सियासी चुनौती
ईरान के खिलाफ सैन्य अभियान के बावजूद इजराइल की घरेलू राजनीति में नेतन्याहू को अपेक्षित सफलता नहीं मिलती दिख रही है। राजनीतिक समीकरणों में बदलाव और अरब पार्टियों की बढ़ती भूमिका ने सत्ता की गणित को प्रभावित किया है। इस घटनाक्रम को नेतन्याहू की राजनीतिक स्थिति के लिए बड़ा झटका माना जा रहा है।
जंग की कीमत और उसके राजनीतिक परिणाम अब दोनों देशों में चर्चा का विषय बन गए हैं। अमेरिका में ट्रंप प्रशासन को विपक्ष के दबाव का सामना करना पड़ सकता है। यदि डेमोक्रेट्स का कांग्रेस और सीनेट में प्रभाव बढ़ता है, तो ईरान के खिलाफ किसी भी नए सैन्य अभियान के लिए बजट और राजनीतिक समर्थन जुटाना मुश्किल हो सकता है।
ईरान का संदेश- अमेरिकियों ने जंग के खिलाफ किया मतदान
अमेरिका में ट्रंप को लगे राजनीतिक झटके पर ईरान की ओर से भी प्रतिक्रिया दी गई है। ईरान ने कहा कि अमेरिकियों ने अंतरात्मा की आवाज और महंगाई के बोझ को ध्यान में रखते हुए युद्ध के खिलाफ मतदान किया है। ईरान ने इस संदेश का समर्थन करते हुए अमेरिकी सरकार को चेतावनी भी दी कि यदि वह अपने नागरिकों की इच्छा के बजाय बाहरी हितों को प्राथमिकता देती है, तो उसे इसके गंभीर परिणाम भुगतने पड़ सकते हैं।
कुल मिलाकर, ईरान के खिलाफ सैन्य कार्रवाई से अमेरिका और इजराइल अपनी सैन्य ताकत का प्रदर्शन तो कर पाए, लेकिन वहां की सत्ता व्यवस्था को बदलने का लक्ष्य हासिल नहीं कर सके। इस घटनाक्रम ने यह सवाल भी खड़ा कर दिया है कि किसी देश के शीर्ष नेता को निशाना बनाना और उसकी पूरी राजनीतिक व्यवस्था को बदलना दो अलग-अलग चुनौतियां हैं।
