वॉशिंगटन/बीजिंग। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा रूस पर दबाव बनाने के लिए चीन और भारत समेत प्रमुख तेल खरीदार देशों पर टैरिफ लगाने की अपील के बाद अंतरराष्ट्रीय राजनीति में हलचल तेज हो गई है। ट्रंप के बयान के कुछ ही घंटों बाद चीन ने अमेरिका को सख्त चेतावनी देते हुए कहा कि बीजिंग न तो युद्ध की साजिश करता है और न ही उसमें हिस्सा लेता है।
चीनी विदेश मंत्री वांग यी ने स्लोवेनिया यात्रा के दौरान स्पष्ट कहा कि “युद्ध किसी समस्या का समाधान नहीं है और आर्थिक प्रतिबंध केवल वैश्विक जटिलताओं को बढ़ाते हैं।” उन्होंने यह भी दोहराया कि चीन स्वतंत्र नीति पर कायम है और दबाव की राजनीति स्वीकार नहीं करेगा।
दरअसल, राष्ट्रपति ट्रंप ने नाटो देशों और जी-7 समूह से आग्रह किया है कि वे रूस से तेल की खरीद तुरंत बंद करें और चीन पर 100 प्रतिशत तक टैरिफ लगाएं। ट्रंप ने अपने पत्र में लिखा, “मैं रूस पर बड़े प्रतिबंध लगाने को तैयार हूं, जब सभी नाटो देश सहमत होंगे और ऐसा करना शुरू करेंगे। मैं तैयार हूं, जब आप तैयार हों।”
अमेरिका ने पहले ही भारत पर रूसी तेल खरीदने के लिए टैरिफ लगा दिया है, लेकिन चीन पर अब तक कोई सीधा आर्थिक प्रतिबंध लागू नहीं किया गया है। ट्रंप की यह अपील ऐसे समय में आई है जब रूस-यूक्रेन युद्ध थमने के कोई संकेत नहीं दिख रहे और पश्चिमी देशों पर दबाव बढ़ रहा है कि वे मास्को को आर्थिक रूप से कमजोर करें।
जी-7 देशों—कनाडा, फ्रांस, जर्मनी, इटली, जापान और ब्रिटेन से भी अमेरिका ने अपील की है कि वे भारत और चीन पर टैरिफ लगाकर रूस की अर्थव्यवस्था पर सामूहिक दबाव डालें। अमेरिकी वित्त मंत्री स्कॉट बेसेंट ने जी-7 देशों के वित्त मंत्रियों से कहा, “केवल एकजुट प्रयास से ही हम रूसी अर्थव्यवस्था पर पर्याप्त दबाव बना पाएंगे और युद्ध को समाप्त कर सकेंगे।”
चीन की ओर से आए इस कड़े संदेश ने साफ कर दिया है कि बीजिंग अमेरिका के टैरिफ युद्ध में शामिल होने को तैयार नहीं है। अब देखना यह होगा कि ट्रंप की अपील पर नाटो और जी-7 देश किस हद तक साथ आते हैं और इसका वैश्विक ऊर्जा बाजार पर क्या असर पड़ता है।
