नेपाल के प्रधानमंत्री Balen Shah के एक बयान ने नेपाल की राजनीति में बड़ा विवाद खड़ा कर दिया है। संसद में उन्होंने कहा कि सिर्फ भारत ने ही नेपाल की जमीन पर अतिक्रमण नहीं किया, बल्कि नेपाल ने भी कुछ स्थानों पर भारतीय भूमि का उपयोग किया है। बयान सामने आते ही विपक्ष, पूर्व मंत्रियों और पूर्व राजनयिकों ने सरकार से इस दावे के सबूत मांग लिए।
विवाद बढ़ने के बाद नेपाल के विदेश मंत्रालय को सफाई जारी करनी पड़ी। मंत्रालय ने स्पष्ट किया कि प्रधानमंत्री का आशय भारत की जमीन पर नेपाल के आधिकारिक कब्जे से नहीं था। उनका संदर्भ सीमा क्षेत्र की तथाकथित “10 गजा” भूमि से था, जहां वर्षों से स्थानीय लोगों द्वारा खेती, आवास और अन्य गतिविधियां होती रही हैं।
भारत-नेपाल सीमा विवाद की जड़ें 1816 की Treaty of Sugauli तक जाती हैं। इसी संधि के आधार पर दोनों देशों की आधुनिक सीमा तय हुई थी। समय के साथ नदियों के मार्ग बदलने और सीमा निर्धारण की अलग-अलग व्याख्याओं के कारण Kalapani, Lipulekh और Susta जैसे क्षेत्रों को लेकर विवाद पैदा हुआ।
साल 2020 में नेपाल ने नया राजनीतिक नक्शा जारी कर इन विवादित क्षेत्रों को अपने हिस्से के रूप में दिखाया था, जिसे भारत ने एकतरफा कदम बताते हुए खारिज कर दिया था। इसके बाद दोनों देशों के बीच सीमा मुद्दे को लेकर कई दौर की कूटनीतिक चर्चाएं भी हुईं।
विशेषज्ञों के अनुसार भारत और नेपाल की लगभग 1,880 किलोमीटर लंबी सीमा में करीब 97 प्रतिशत हिस्सा पहले से तय और स्वीकार किया जा चुका है। विवाद केवल कुछ सीमित लेकिन रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण क्षेत्रों को लेकर है। यही कारण है कि समय-समय पर ऐसे बयान दोनों देशों के रिश्तों में तनाव की चर्चा को फिर से हवा दे देते हैं।
हालांकि, भारत की ओर से इस ताजा बयान पर कोई तीखी सार्वजनिक प्रतिक्रिया नहीं आई है। माना जा रहा है कि नई दिल्ली सीमा विवाद को बातचीत और कूटनीतिक माध्यमों से सुलझाने की अपनी पुरानी नीति पर कायम है। भारत और नेपाल के बीच ऐतिहासिक, सांस्कृतिक, आर्थिक और जन-जन के स्तर पर मजबूत संबंध हैं, इसलिए दोनों देश आमतौर पर ऐसे मुद्दों को संवाद के जरिए सुलझाने को प्राथमिकता देते हैं।
