Chaitra Navratri 2026: नई दिल्ली। चैत्र नवरात्र 2026 इस साल 19 मार्च से 27 मार्च तक मनाया जाएगा। इस दौरान दस महाविद्याओं की उपासना का विशेष महत्व है। इन महाविद्याओं में सातवीं शक्ति, माता धूमावती, अपनी रहस्यमयी और विकट स्वरूप के कारण अन्य देवियों से अलग हैं। जहां अन्य देवी आभूषण और सौंदर्य से सुसज्जित होती हैं, वहीं मां धूमावती का रूप सांसारिक दृष्टि से अलक्ष्मी और अमंगलकारी प्रतीत होता है। लेकिन उनके इस विकट रूप के पीछे छिपा करुणामय और आध्यात्मिक स्वरूप साधकों के लिए मोक्ष का द्वार खोलता है।
मां धूमावती का स्वरूप
तंत्र शास्त्र के अनुसार, माता धूमावती विधवा स्वरूप में विराजमान हैं। उनका वर्ण फीका है और वे मलिन वस्त्र धारण करती हैं। उनके केश खुले और रूखे हैं, और शारीरिक विशेषताएँ शत्रुओं के हृदय में भय उत्पन्न करती हैं। उनके रथ के ध्वज पर कौए का चिह्न है और हाथ में उन्होंने शूर्प (सूप) धारण किया है। उनकी नाक बड़ी, नेत्र कुटिल और स्तन शिथिल हैं। माता सदैव भूख और प्यास से व्याकुल दिखाई देती हैं, जो शत्रुओं के विनाश और अधर्म के भक्षण का प्रतीक है। इन्हें कलहप्रिया, विरलदंता और चंचला भी कहा जाता है।
विद्वानों के अनुसार, धूमावती माता जगत की उन सभी अभावग्रस्त और कष्टकारी अवस्थाओं की अधिष्ठात्री देवी हैं। उनके उपासक जीवन के अंधकार से मुक्ति पाते हैं और मोक्ष के मार्ग को प्राप्त करते हैं।
धूमावती माता का पावन धाम
उत्तर प्रदेश के प्रसिद्ध तीर्थ नैमिषारण्य स्थित काली पीठ में माता धूमावती का प्राचीन मंदिर है। यहां भक्त अपनी मनोकामनाओं की पूर्ति के लिए काले तिल की पोटली और नारियल अर्पित करते हैं। श्रद्धापूर्वक मांगी गई मन्नतें यहां खाली नहीं जातीं।
सर्वसिद्धि का मंत्र
माता धूमावती की कृपा पाने के लिए उनके आठ नामों वाले स्तोत्र का पाठ अमोघ माना जाता है। भगवान शिव स्वयं माता पार्वती से कहते हैं कि जो भक्त इस स्तोत्र का पाठ करता है, उसे सभी सिद्धियां प्राप्त होती हैं।
“भद्रकाली महाकाली डमरूवाद्यकारिणी।
स्फारितनयना चैव टकटंकितहासिनी।।
धूमावती जगत्कर्ती शूर्पहस्ता तथैव च।
अष्टनामात्मकं स्तोत्रं यः पठेद्भक्तिसंयुक्तः।
तस्य सर्व्वाथसिद्धिः स्यात्सत्यं सत्यं हि पार्वति।।”
मोह का नाश और शिवत्व की प्राप्ति
माता धूमावती की साधना का उद्देश्य मोह का विनाश है। मानव जीवन अज्ञान और आसुरी प्रवृत्तियों के मोह में फंसा रहता है। माता धूमावती इस मोह रूपी आवरण को नष्ट कर जीव को शिव तत्व से मिलाती हैं। उनकी साधना अत्यंत उग्र और कठिन होती है, इसलिए बिना योग्य गुरु के निर्देशन के इसे करना नहीं चाहिए।
विधवा रूप की कहानी
धूमावती माता मां पार्वती का विधवा रूप हैं। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, एक बार मां पार्वती को अत्यधिक भूख लगी थी, जिसके कारण उन्होंने शिव जी को निगल लिया और इसके बाद उनका रूप विधवा हो गया। इसी रूप को धूमावती माता के नाम से जाना गया।
साधकों की मनोकामनाएं पूर्ण करती हैं
नवरात्रि के दौरान धूमावती माता की विशेष पूजा से साधकों की सारी मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं। उनका आशीर्वाद जीवन से अंधकार को दूर करता है और मोक्ष के द्वार खोलता है। उनके पूजा और साधना से भक्तों का आध्यात्मिक और सांसारिक जीवन दोनों ही उज्जवल होता है।
