प्रकृति केवल मानव जीवन का आधार नहीं, बल्कि हमारी संस्कृति, परंपरा और भविष्य की संरक्षक भी है। स्वच्छ वायु, निर्मल जल, घने वन और समृद्ध जैव विविधता किसी भी सभ्य समाज की अमूल्य धरोहर हैं। तेजी से बढ़ते शहरीकरण, जलवायु परिवर्तन और प्राकृतिक संसाधनों पर बढ़ते दबाव के बीच पर्यावरण संरक्षण आज मानव अस्तित्व की अनिवार्य आवश्यकता बन चुका है। प्रतिवर्ष 5 जून को मनाया जाने वाला विश्व पर्यावरण दिवस हमें प्रकृति के प्रति अपने दायित्वों का स्मरण कराता है।
प्राकृतिक संसाधनों से समृद्ध छत्तीसगढ़ पर्यावरण संरक्षण और विकास के बीच संतुलन स्थापित करने की दिशा में निरंतर प्रयास कर रहा है। राज्य के विशाल वन क्षेत्र, जैव विविधता और जल संसाधन इसकी विशिष्ट पहचान हैं। मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय के नेतृत्व में राज्य सरकार हरित विकास, जल संरक्षण और जनभागीदारी को केंद्र में रखकर विभिन्न योजनाओं का सफल संचालन कर रही है।
छत्तीसगढ़ में वृक्षारोपण को केवल पर्यावरण संरक्षण तक सीमित नहीं रखा गया है, बल्कि इसे ग्रामीण अर्थव्यवस्था और किसानों की आय से भी जोड़ा गया है। हरियाली प्रसार योजना और किसान वृक्ष मित्र योजना के माध्यम से किसानों को कृषि वानिकी के लिए पौधे उपलब्ध कराए जा रहे हैं तथा उन्हें अपनी भूमि पर वृक्ष लगाने के लिए प्रोत्साहित किया जा रहा है। इससे हरित क्षेत्र का विस्तार होने के साथ किसानों को दीर्घकालिक आर्थिक लाभ भी प्राप्त हो रहा है।
विश्व पर्यावरण दिवस के अवसर पर संचालित “एक पेड़ मां के नाम” अभियान ने पर्यावरण संरक्षण को जनभावनाओं से जोड़ने का कार्य किया है। इस अभियान के माध्यम से बड़ी संख्या में नागरिक अपनी माताओं के सम्मान में पौधारोपण कर पर्यावरण संरक्षण का संदेश दे रहे हैं। यह पहल पर्यावरणीय जिम्मेदारी को सामाजिक आंदोलन का स्वरूप प्रदान कर रही है।
तेजी से बढ़ते शहरीकरण के बीच स्वच्छ और स्वस्थ वातावरण बनाए रखने के लिए राज्य में ऑक्सीवन योजना के तहत ऑक्सीजन पार्क और हरित क्षेत्र विकसित किए जा रहे हैं। वहीं पर्यावरण वानिकी योजना के माध्यम से सड़कों के किनारे वृक्षारोपण, पर्यावरण पार्कों का निर्माण तथा सार्वजनिक स्थलों का हरित विकास किया जा रहा है। इन प्रयासों से प्रदूषण नियंत्रण के साथ नागरिकों को बेहतर जीवन गुणवत्ता भी प्राप्त हो रही है।
जलवायु परिवर्तन के प्रभावों को देखते हुए जल संरक्षण राज्य सरकार की प्राथमिकताओं में शामिल है। ‘मोर गांव मोर पानी’ और ‘मोर गांव मोर तरिया’ जैसे अभियान ग्रामीण क्षेत्रों में जल संरक्षण की नई चेतना पैदा कर रहे हैं। परंपरागत तालाबों के पुनर्जीवन, वर्षा जल संचयन, चेक डैम निर्माण और जल पुनर्भरण संरचनाओं के विकास के माध्यम से भूजल स्तर में सुधार के प्रयास किए जा रहे हैं।
राज्य में भूजल एवं जल संरक्षण कार्यक्रमों के तहत जल स्रोतों के संरक्षण और संवर्धन पर विशेष बल दिया जा रहा है। यह पहल आने वाली पीढ़ियों के लिए जल सुरक्षा सुनिश्चित करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम साबित हो रही है।
प्राकृतिक पारिस्थितिकी तंत्र को मजबूत बनाने के लिए नदी तट वृक्षारोपण योजना के अंतर्गत नदी किनारों पर बड़े पैमाने पर पौधारोपण किया जा रहा है। इससे मिट्टी के कटाव पर नियंत्रण, भूजल संवर्धन और जैव विविधता संरक्षण को बढ़ावा मिल रहा है। इसके साथ ही आर्द्रभूमि जलवायु अनुकूलन परियोजना के तहत महानदी जलग्रहण क्षेत्र में वेटलैंड संरक्षण और पुनर्जीवन के कार्य किए जा रहे हैं।
पर्यावरण संरक्षण की सफलता जन-जागरूकता और जनभागीदारी पर निर्भर करती है। इसी उद्देश्य से राष्ट्रीय हरित कोर योजना और ईको-क्लब कार्यक्रमों के माध्यम से स्कूलों और महाविद्यालयों के विद्यार्थियों को पर्यावरणीय गतिविधियों से जोड़ा जा रहा है। वृक्षारोपण, स्वच्छता अभियान, जल संरक्षण और जैव विविधता संरक्षण संबंधी कार्यक्रमों के जरिए युवाओं में प्रकृति के प्रति संवेदनशीलता विकसित की जा रही है।
पर्यावरण संरक्षण केवल सरकारी योजनाओं से संभव नहीं है। इसके लिए प्रत्येक नागरिक की सक्रिय भागीदारी आवश्यक है। एक पौधा लगाना, जल की बचत करना, प्लास्टिक का सीमित उपयोग करना, प्राकृतिक संसाधनों का विवेकपूर्ण उपयोग करना और स्वच्छता बनाए रखना जैसे छोटे-छोटे कदम बड़े परिवर्तन का आधार बन सकते हैं।
विश्व पर्यावरण दिवस हमें यह संदेश देता है कि विकास और पर्यावरण एक-दूसरे के विरोधी नहीं, बल्कि पूरक हैं। छत्तीसगढ़ आज हरियाली, जल संरक्षण और जनभागीदारी आधारित विकास मॉडल के माध्यम से इसी संतुलित दृष्टिकोण को साकार कर रहा है। यदि हम सभी पर्यावरण संरक्षण को अपनी जीवनशैली का हिस्सा बनाएं, तो आने वाली पीढ़ियों को एक स्वच्छ, हरित और सुरक्षित पृथ्वी सौंप सकेंगे।
धरती हमें विरासत में नहीं मिली है, बल्कि हमने इसे आने वाली पीढ़ियों से उधार लिया है। इसलिए पर्यावरण की रक्षा करना हम सभी का नैतिक दायित्व है।
