धमतरी जिले के नगरी विकासखंड की ग्राम पंचायत अमाली की आदिवासी बिहान स्व-सहायता समूह की महिलाओं ने तालाबों और जलाशयों में उगने वाली अजोला (Azolla) को आजीविका, प्राकृतिक खेती और आत्मनिर्भरता का प्रभावी माध्यम बना दिया है। प्रशिक्षण, वैज्ञानिक तकनीक और सामूहिक प्रयासों के बल पर यह पहल जिले में प्रेरणादायक मॉडल के रूप में उभर रही है।
ग्राम पंचायत अमाली की कृषि सखी और बिहान समूह की सदस्य अनिता बाई मरकाम ने प्रशिक्षण प्राप्त करने के बाद अपने घर में छोटे-छोटे टैंकों में अजोला उत्पादन शुरू किया। उन्होंने बताया कि पशु चिकित्सा विभाग से अजोला का बीज (कल्चर) मिलने के बाद नियमित देखभाल और वैज्ञानिक पद्धति से उत्पादन करते हुए अब तक लगभग 25 किलोग्राम अजोला तैयार किया जा चुका है। भविष्य में उत्पादन बढ़ाने की भी योजना है।
समूह द्वारा तैयार अजोला का उपयोग धान की खेती में जैविक पूरक के रूप में किया जा रहा है। इससे मिट्टी की उर्वरता बढ़ती है, नमी का संरक्षण होता है और पौधों को आवश्यक सूक्ष्म पोषक तत्व मिलते हैं। यह प्रयोग प्राकृतिक खेती को बढ़ावा देने और रासायनिक उर्वरकों पर निर्भरता कम करने में किसानों के लिए उपयोगी साबित हो रहा है।
अजोला का उपयोग केवल खेती तक सीमित नहीं है। इसे पशुपालन, मत्स्य पालन और कुक्कुट पालन में पौष्टिक पूरक आहार के रूप में भी इस्तेमाल किया जा रहा है। इससे पशुओं के पोषण में सुधार, मछलियों की बेहतर वृद्धि और मुर्गी पालन में अच्छे परिणाम मिल रहे हैं। कम लागत वाला यह स्थानीय संसाधन ग्रामीणों की आय बढ़ाने के साथ उत्पादन लागत कम करने में भी मददगार बन रहा है।
अनिता बाई मरकाम ने बताया कि जो अजोला पहले केवल एक नई जानकारी था, वही आज उनके परिवार, समूह की अन्य महिलाओं और आसपास के किसानों के लिए उपयोगी संसाधन बन गया है। समूह की महिलाएं अपने पशुओं को अजोला खिलाने के साथ-साथ खेती में भी इसका उपयोग कर रही हैं, जिससे उन्हें आर्थिक लाभ और प्राकृतिक खेती अपनाने का आत्मविश्वास मिला है।
बिहान समूह की महिलाओं का कहना है कि जिस अजोला को पहले महत्वहीन समझा जाता था, वही आज उनकी आजीविका का मजबूत आधार बन चुका है। समूह भविष्य में जैविक खाद, वर्मी कम्पोस्ट और अन्य मूल्यवर्धित उत्पादों के निर्माण की दिशा में भी कार्य करने की तैयारी कर रहा है। इस पहल में चेतन कुमार नेताम और तुषार यादव ने भी सहयोग दिया।
ग्राम पंचायत अमाली की यह पहल दर्शाती है कि स्थानीय संसाधनों का वैज्ञानिक और नवाचारी उपयोग ग्रामीण अर्थव्यवस्था को नई दिशा दे सकता है। महिला सशक्तिकरण, प्राकृतिक खेती, पर्यावरण संरक्षण, किसानों की लागत में कमी और आत्मनिर्भर ग्रामीण विकास की दिशा में यह मॉडल एक प्रेरक सफलता की कहानी बनकर सामने आया है।
