भारत में सैटेलाइट इंटरनेट सेवाओं को तेजी से शुरू करने के लिए सरकार मंजूरी प्रक्रिया को आसान बनाने की तैयारी कर रही है। इसके लिए स्पेस सेक्टर में सिंगल-विंडो क्लीयरेंस सिस्टम लागू करने पर विचार किया जा रहा है। इसका उद्देश्य कंपनियों को अलग-अलग सरकारी विभागों से बार-बार मंजूरी लेने की प्रक्रिया से राहत देना और सेवाएं जल्द शुरू कराने में मदद करना है।
प्रस्तावित व्यवस्था को लेकर डिपार्टमेंट ऑफ टेलीकम्युनिकेशंस (DoT), मिनिस्ट्री ऑफ इंफॉर्मेशन एंड ब्रॉडकास्टिंग (MIB) और इंडियन नेशनल स्पेस प्रमोशन एंड ऑथराइजेशन सेंटर (IN-SPACe) के बीच चर्चा हो चुकी है। शुरुआत में IN-SPACe से जुड़ी मंजूरियों को सिंगल-विंडो व्यवस्था के तहत लाने की योजना है। बाद में अन्य मंत्रालयों और विभागों को भी इसमें शामिल किया जा सकता है।
फिलहाल सैटेलाइट कम्युनिकेशन कंपनियों को कई स्तरों पर मंजूरी लेनी पड़ती है। DoT, MIB और IN-SPACe के अलावा जरूरत के अनुसार अंतरिक्ष विभाग, गृह मंत्रालय, विदेश मंत्रालय और सुरक्षा एजेंसियों से भी मंजूरी या सलाह की आवश्यकता होती है। इससे कंपनियों के लिए सेवाएं शुरू करने की प्रक्रिया लंबी हो जाती है।
जून 2026 में स्पेस स्टार्टअप्स और टेक्नोलॉजी कंपनियों के साथ हुई बैठक में भी सिंगल-विंडो क्लीयरेंस की मांग उठी थी। उद्योग जगत का मानना है कि मंजूरी प्रक्रिया सरल होने से भारत में सैटेलाइट इंटरनेट सेवाओं के विस्तार को गति मिल सकती है।
इसके साथ ही सरकार ग्लोबल सैटेलाइट ऑपरेटरों के लिए भारतीय कंपनियों के साथ समन्वय की व्यवस्था पर भी विचार कर रही है। प्रस्तावित स्पेक्ट्रम असाइनमेंट नियमों में नॉन-जियोस्टेशनरी ऑर्बिट (NGSO) ऑपरेटरों के लिए भारतीय कॉन्स्टेलेशन के साथ तालमेल की शर्त शामिल किए जाने की संभावना है।
इस कदम का उद्देश्य भारत में विदेशी और घरेलू सैटेलाइट इंटरनेट कंपनियों के बीच संतुलन बनाए रखना और यह सुनिश्चित करना है कि विदेशी ऑपरेटर अपने बेहतर ऑर्बिटल स्लॉट्स का इस्तेमाल भारतीय कंपनियों के हितों को प्रभावित करने के लिए न कर सकें।
