खल्लारी माता मंदिर छत्तीसगढ़ के महासमुंद जिला मुख्यालय से लगभग 25 किलोमीटर दूर खल्लारी पहाड़ी की चोटी पर स्थित एक प्राचीन, ऐतिहासिक और धार्मिक स्थल है। प्राचीन काल में इस क्षेत्र को खलवाटिका के नाम से जाना जाता था। मंदिर तक पहुंचने के लिए श्रद्धालुओं को करीब 850 सीढ़ियां चढ़नी पड़ती हैं, हालांकि अब यहां रोप-वे की सुविधा उपलब्ध होने से दर्शन करना काफी आसान हो गया है।
यह मंदिर श्रद्धालुओं की गहरी आस्था का केंद्र है। मान्यता है कि यहां सच्चे मन से की गई प्रार्थना और मनोकामना ज्योति प्रज्ज्वलित करने से भक्तों की इच्छाएं पूर्ण होती हैं। विशेष रूप से संतान सुख की कामना लेकर आने वाले दंपत्ति यहां माता के दर्शन और ज्योति प्रज्ज्वलन करते हैं।
मंदिर में वर्ष 1985 में पहली बार ज्योत प्रज्ज्वलित की गई थी। तब से प्रत्येक चैत्र और शारदीय नवरात्रि में यहां हजारों ज्योतियां जलाई जाती हैं। नवरात्रि के दौरान प्रतिदिन लगभग 30 से 35 हजार श्रद्धालु माता के दर्शन के लिए पहुंचते हैं। वहीं चैत पूर्णिमा पर आयोजित खल्लारी मेला महोत्सव में लाखों श्रद्धालु शामिल होते हैं।
खल्लारी का उल्लेख द्वापर युग से जुड़ी लोककथाओं में भी मिलता है। मान्यता है कि राक्षस राजा हिडिम्ब की राजधानी सिरपुर थी और उसने खल्लारी क्षेत्र में एक सुंदर वाटिका बनवाई थी, जिसे खलवाटिका कहा जाता था। हिडिम्ब की बहन हिडिम्बनी यहां स्थित देवी शक्ति की आराधना करती थी।
लोककथाओं के अनुसार पांडवों के वनवास काल में वे इस क्षेत्र में पहुंचे थे। इसी दौरान हिडिम्बनी की भेंट भीम से हुई। कहा जाता है कि हिडिम्बनी ने भीम की शक्ति की परीक्षा ली थी। खल्लारी पहाड़ी पर आज भी ऐसी चट्टानों की चर्चा होती है, जिन पर भीम के पदचिह्न होने की लोकमान्यता प्रचलित है। बाद में भीम और हिडिम्बनी का विवाह हुआ तथा उनके पुत्र घटोत्कच का जन्म हुआ, जिसका उल्लेख महाभारत में मिलता है।
मंदिर में प्रतिदिन माता को अलग-अलग प्रकार का भोग अर्पित किया जाता है। सोमवार को तिखुर का हलवा, मंगलवार को सिंघाड़ा का हलवा, बुधवार को बेसन लड्डू और मूंग दाल खिचड़ी, गुरुवार को खीर-पूड़ी, शुक्रवार को पंचमेवा और मूंग दाल खिचड़ी, शनिवार को हलवा, पूड़ी-चना तथा रविवार को अनार, मौसमी फल और दाल-चावल का भोग लगाया जाता है। प्रत्येक दिन पान भी अर्पित किया जाता है।
विशेष अवसरों पर भी माता को विशेष भोग लगाया जाता है। पूर्णिमा के दिन मालपुआ, मीठा चावल, बूंदी और पान अर्पित किया जाता है, जबकि अमावस्या पर सोंठ, मखाना, दाल-चावल और पान का भोग लगाया जाता है।
धार्मिक महत्व, प्राकृतिक सौंदर्य, ऐतिहासिक लोककथाओं और श्रद्धालुओं की अटूट आस्था के कारण खल्लारी माता मंदिर छत्तीसगढ़ के प्रमुख शक्ति स्थलों में विशेष स्थान रखता है।
