बालेन शाह की सरकार लिपुलेख विवाद को लेकर नेपाल में विपक्ष के निशाने पर आ गई है। कैलाश मानसरोवर यात्रा के लिए भारत और चीन द्वारा लिपुलेख दर्रे के इस्तेमाल की घोषणा के बाद नेपाल सरकार ने दोनों देशों को कूटनीतिक नोट भेजकर आपत्ति जताई थी। अब इसी मुद्दे पर नेपाली संसद में सरकार को घेरने की कोशिश तेज हो गई है।
नेपाल की विपक्षी पार्टियों ने सरकार से सिर्फ “प्रोटेस्ट नोट” तक सीमित न रहने और भारत-चीन के साथ सीधे उच्चस्तरीय वार्ता करने की मांग की है। नेपाली कांग्रेस के नेतृत्व वाले विपक्ष का कहना है कि सरकार को इस मुद्दे पर और सख्त रुख अपनाना चाहिए।
विपक्षी सांसदों ने उठाए सवाल
नेपाल संसद की अंतरराष्ट्रीय संबंध समिति में विपक्षी सांसदों ने सरकार की रणनीति पर सवाल खड़े किए। नेपाली कांग्रेस के सांसद संदीप राणा ने कहा कि लिपुलेख, लिंपियाधूरा और कालापानी नेपाल के हिस्से हैं और भारत इनका उपयोग अपनी मर्जी से कर रहा है।
वहीं सीपीएन-यूएमएल की सांसद भूमिका लिंबू सुबा ने भारत की प्रतिक्रिया को “गैर-जिम्मेदाराना” बताया। विपक्ष का कहना है कि नेपाल सरकार को इन क्षेत्रों के मुद्दे पर सीधे बातचीत करनी चाहिए।
भारत का रुख क्या है?
भारत का विदेश मंत्रालय ने स्पष्ट किया है कि लिपुलेख मार्ग से कैलाश मानसरोवर यात्रा दशकों से संचालित होती रही है और इसमें कुछ नया नहीं है।
भारत ने नेपाल के विस्तारित नक्शे को “एकतरफा” और “कृत्रिम” बताते हुए कहा है कि वह बातचीत के लिए तैयार है, लेकिन ऐतिहासिक तथ्यों से छेड़छाड़ या अनुचित दबाव स्वीकार नहीं किया जाएगा।
क्यों महत्वपूर्ण है लिपुलेख?
लिपुलेख, लिंपियाधूरा और कालापानी क्षेत्र भारत, नेपाल और चीन के त्रि-जंक्शन के पास स्थित हैं। सामरिक दृष्टि से लिपुलेख भारत के लिए बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है। नेपाल में राजनीतिक बदलाव के दौरान यह मुद्दा अक्सर चर्चा में आता रहा है।
विशेषज्ञों का मानना है कि नेपाल के भीतर बढ़ता राजनीतिक दबाव भारत-नेपाल संबंधों में नई संवेदनशीलता पैदा कर सकता है। हालांकि दोनों देशों के बीच लंबे समय से सामाजिक और सांस्कृतिक स्तर पर “रोटी-बेटी” का रिश्ता रहा है।
