हिमाचल प्रदेश के कांगड़ा जिले में स्थित मां ज्वाला देवी मंदिर देश के प्रसिद्ध शक्तिपीठों में शामिल है। यह मंदिर अपनी प्राकृतिक ज्वालाओं और सदियों पुरानी धार्मिक मान्यताओं के लिए जाना जाता है। मान्यता है कि यहां माता सती की जीभ गिरी थी। मंदिर की विशेषता यह है कि यहां नौ प्राकृतिक ज्वालाएं प्रज्वलित रहती हैं, जिन्हें देवी के विभिन्न स्वरूपों का प्रतीक माना जाता है। इसके अलावा मंदिर के पास स्थित गोरख डिब्बी कुंड और मुगल सम्राट अकबर से जुड़ी कथाएं भी श्रद्धालुओं के बीच काफी प्रचलित हैं।
ज्वाला देवी मंदिर में जलती हैं नौ पवित्र ज्वालाएं
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, मां ज्वाला देवी मंदिर में नौ प्राकृतिक ज्वालाएं विशेष आस्था का केंद्र हैं। इन ज्वालाओं को देवी के अलग-अलग स्वरूपों से जोड़कर देखा जाता है। इनमें प्रमुख ज्वाला को महाकाली का स्वरूप माना जाता है, जो चांदी की जाली के बीच स्थित है।
मंदिर में मौजूद अन्य आठ ज्वालाओं को अन्नपूर्णा, हिंगलाज, चंडी, विंध्यवासिनी, सरस्वती, महालक्ष्मी, अंबिका और अंजी देवी के स्वरूप के रूप में पूजा जाता है। श्रद्धालु इन ज्वालाओं के दर्शन कर माता का आशीर्वाद लेते हैं। प्राकृतिक रूप से निकलने वाली गैस के जलने से ऐसी ज्वालाएं बन सकती हैं, हालांकि इनके धार्मिक महत्व को लेकर भक्तों की गहरी आस्था जुड़ी हुई है।
51 शक्तिपीठों में शामिल है मां ज्वाला देवी मंदिर
पौराणिक मान्यता के अनुसार, जब देवी सती ने अपने प्राण त्याग दिए, तब भगवान शिव उनके शरीर को लेकर विचरण करने लगे। भगवान विष्णु ने सृष्टि का संतुलन बनाए रखने के लिए अपने सुदर्शन चक्र से देवी सती के शरीर के विभिन्न अंगों को अलग किया। मान्यता है कि जहां-जहां उनके अंग या आभूषण गिरे, वहां शक्तिपीठ स्थापित हुए।
धार्मिक विश्वास के मुताबिक, हिमाचल प्रदेश के कांगड़ा स्थित ज्वाला देवी मंदिर में माता सती की जीभ गिरी थी। इसी वजह से इस स्थान को प्रमुख शक्तिपीठों में गिना जाता है। यहां वर्षभर बड़ी संख्या में श्रद्धालु दर्शन और पूजा-अर्चना के लिए पहुंचते हैं।
गोरखनाथ से जुड़ी है ज्वाला देवी मंदिर की पौराणिक कथा
मंदिर से जुड़ी एक प्रचलित कथा गुरु गोरखनाथ की भक्ति से संबंधित है। कहा जाता है कि गुरु गोरखनाथ मां ज्वाला देवी के परम भक्त थे। एक बार उन्हें तेज भूख लगी, तो उन्होंने माता से कहा कि वे आग जलाकर पानी गर्म रखें, तब तक वह भिक्षा लेकर आते हैं।
लोकमान्यता के अनुसार, माता ने आग जला दी, लेकिन गुरु गोरखनाथ वापस नहीं लौटे। कहा जाता है कि तभी से यहां ज्वाला निरंतर प्रज्वलित है और माता अपने भक्त की प्रतीक्षा कर रही हैं। एक अन्य धार्मिक विश्वास के अनुसार, सतयुग आने पर गुरु गोरखनाथ वापस लौटेंगे। यह कथा मंदिर की आस्था और परंपरा का अहम हिस्सा मानी जाती है।
गोरख डिब्बी कुंड का रहस्य क्या है?
मां ज्वाला देवी मंदिर के पास स्थित गोरख डिब्बी कुंड भी श्रद्धालुओं के आकर्षण का केंद्र है। स्थानीय मान्यता के अनुसार, कुंड का पानी देखने में खौलता हुआ प्रतीत होता है, लेकिन छूने पर ठंडा महसूस होता है। इसी विशेषता के कारण इसे लेकर लोगों में उत्सुकता बनी रहती है।
इस कुंड से जुड़ी धार्मिक कथाएं गुरु गोरखनाथ की तपस्या और साधना से जोड़ी जाती हैं। हालांकि, पानी के तापमान और इस तरह दिखाई देने वाली घटना के पीछे के कारणों को समझने के लिए वैज्ञानिक जांच और प्रमाण आवश्यक हैं।
अकबर से जुड़ी है सोने के छत्र की कथा
ज्वाला देवी मंदिर से जुड़ी एक अन्य लोकप्रिय कथा मुगल सम्राट अकबर के समय की बताई जाती है। लोककथा के अनुसार, अकबर ने मंदिर की ज्वाला को बुझाने के लिए उसे लोहे के ढक्कन से ढकने और पानी डालने का प्रयास किया था। मान्यता है कि वह इसमें सफल नहीं हो सका।
कथा के मुताबिक, इसके बाद अकबर ने देवी को सोने का छत्र भेंट किया। कहा जाता है कि देवी की शक्ति पर संदेह करने के कारण वह छत्र किसी दूसरी धातु में बदल गया। इस घटना को मंदिर की धार्मिक मान्यताओं में विशेष स्थान प्राप्त है। हालांकि, यह विवरण ऐतिहासिक रूप से प्रमाणित तथ्य के बजाय प्रचलित धार्मिक कथा के रूप में देखा जाना चाहिए।
श्रद्धालुओं के लिए विशेष आस्था का केंद्र है ज्वाला देवी मंदिर
मां ज्वाला देवी मंदिर अपनी प्राकृतिक ज्वालाओं, पौराणिक कथाओं और धार्मिक परंपराओं के कारण देशभर के श्रद्धालुओं के लिए महत्वपूर्ण तीर्थस्थल है। यहां आने वाले भक्त माता के दर्शन के साथ नौ ज्वालाओं की पूजा करते हैं और गोरख डिब्बी कुंड जैसे स्थलों को भी देखते हैं। हिमाचल प्रदेश की धार्मिक विरासत में इस मंदिर का विशेष स्थान है।
