महाराष्ट्र के छत्रपति संभाजीनगर (पूर्व में औरंगाबाद) जिले के वेरुल गांव में स्थित घृष्णेश्वर ज्योतिर्लिंग भगवान शिव के 12 ज्योतिर्लिंगों में अंतिम और अत्यंत पवित्र ज्योतिर्लिंग माना जाता है। विश्व प्रसिद्ध एलोरा गुफाओं के निकट स्थित यह मंदिर धार्मिक आस्था, इतिहास और वास्तुकला का अद्भुत संगम है। हर वर्ष देश-विदेश से लाखों श्रद्धालु यहां भगवान शिव के दर्शन के लिए पहुंचते हैं।
घृष्णेश्वर ज्योतिर्लिंग का पौराणिक महत्व
शिवपुराण के अनुसार, सुधर्मा नामक ब्राह्मण और उनकी पत्नी सुदेहा संतानहीन थे। संतान प्राप्ति की इच्छा से सुदेहा ने अपनी छोटी बहन घुश्मा का विवाह सुधर्मा से करा दिया। घुश्मा भगवान शिव की अनन्य भक्त थीं और प्रतिदिन 101 शिवलिंग बनाकर उनकी पूजा करती थीं तथा उन्हें जल में विसर्जित कर देती थीं।
भगवान शिव की कृपा से घुश्मा को पुत्र प्राप्त हुआ, लेकिन ईर्ष्या के कारण सुदेहा ने बालक की हत्या कर दी। पुत्र की मृत्यु के बाद भी घुश्मा ने भगवान शिव की भक्ति नहीं छोड़ी। उनकी अटूट श्रद्धा और समर्पण से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने उनके पुत्र को पुनर्जीवित कर दिया और उसी स्थान पर ज्योतिर्लिंग के रूप में प्रकट हुए। घुश्मा की भक्ति के सम्मान में भगवान शिव ने यहां “घुश्मेश्वर” या “घृष्णेश्वर” नाम से निवास किया।
घृष्णेश्वर मंदिर का इतिहास
घृष्णेश्वर मंदिर का इतिहास कई शताब्दियों पुराना माना जाता है। विभिन्न आक्रमणों के दौरान मंदिर को नुकसान पहुंचा, लेकिन समय-समय पर इसका पुनर्निर्माण किया गया। वर्तमान मंदिर का जीर्णोद्धार 18वीं शताब्दी में मराठा साम्राज्य की प्रसिद्ध धर्मपरायण शासक महारानी अहिल्याबाई होल्कर ने कराया था। उन्होंने भारत के अनेक प्रमुख तीर्थस्थलों के संरक्षण और पुनर्निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी।
मंदिर की वास्तुकला
लाल बलुआ पत्थरों से निर्मित यह मंदिर मराठा और दक्षिण भारतीय स्थापत्य शैली का उत्कृष्ट उदाहरण है। मंदिर की दीवारों और स्तंभों पर देवी-देवताओं, धार्मिक कथाओं और पौराणिक प्रसंगों की सुंदर नक्काशी की गई है। गर्भगृह में स्थापित शिवलिंग स्वयंभू माना जाता है। यहां श्रद्धालुओं को शिवलिंग का स्पर्श कर सीधे जलाभिषेक करने का अवसर मिलता है, जो इसकी प्रमुख विशेषताओं में से एक है।
धार्मिक महत्व
घृष्णेश्वर ज्योतिर्लिंग को 12 ज्योतिर्लिंगों की यात्रा का अंतिम पड़ाव माना जाता है। मान्यता है कि यहां श्रद्धा और भक्ति से पूजा करने वाले भक्तों की मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं। भगवान शिव की कृपा से जीवन में सुख, शांति और समृद्धि प्राप्त होती है। श्रावण मास और महाशिवरात्रि के अवसर पर यहां विशेष धार्मिक आयोजन और भव्य उत्सव आयोजित किए जाते हैं।
दर्शन और पूजा व्यवस्था
मंदिर में प्रतिदिन प्रातःकाल से रात्रि तक दर्शन की व्यवस्था रहती है। श्रद्धालु जलाभिषेक, रुद्राभिषेक, महामृत्युंजय जाप और विशेष पूजाएं करवा सकते हैं। महाशिवरात्रि और सावन के महीने में मंदिर में भक्तों की भारी भीड़ उमड़ती है।
कैसे पहुंचें?
हवाई मार्ग से आने वाले श्रद्धालुओं के लिए निकटतम हवाई अड्डा छत्रपति संभाजीनगर हवाई अड्डा है, जो मंदिर से लगभग 35 किलोमीटर दूर स्थित है।
रेल मार्ग से आने वाले यात्रियों के लिए छत्रपति संभाजीनगर रेलवे स्टेशन सबसे निकट प्रमुख स्टेशन है। यहां से टैक्सी और बस की सुविधा उपलब्ध रहती है।
सड़क मार्ग से महाराष्ट्र के प्रमुख शहरों से वेरुल गांव तक आसानी से पहुंचा जा सकता है। राज्य परिवहन और निजी बस सेवाएं नियमित रूप से संचालित होती हैं।
आसपास के दर्शनीय स्थल
घृष्णेश्वर ज्योतिर्लिंग के निकट स्थित एलोरा गुफाएं विश्व धरोहर स्थल के रूप में प्रसिद्ध हैं। इसके अलावा कैलाश मंदिर, दौलताबाद किला और बीबी का मकबरा भी पर्यटकों और श्रद्धालुओं के आकर्षण का प्रमुख केंद्र हैं।
निष्कर्ष
घृष्णेश्वर ज्योतिर्लिंग भगवान शिव की अनंत कृपा, भक्ति और आस्था का प्रतीक है। घुश्मा की अटूट श्रद्धा की कथा आज भी भक्तों को समर्पण और विश्वास का संदेश देती है। आध्यात्मिक शांति और दिव्य अनुभूति की तलाश में आने वाले श्रद्धालुओं के लिए यह तीर्थस्थल विशेष महत्व रखता है। 12 ज्योतिर्लिंगों में अंतिम होने के कारण घृष्णेश्वर का दर्शन शिवभक्तों की धार्मिक यात्रा को पूर्णता प्रदान करता है।
