प्रदेश में मानसून की सक्रियता बढ़ने और आगामी दिनों में व्यापक वर्षा की संभावना को देखते हुए कृषि वैज्ञानिकों ने किसानों को धान की बुआई और रोपाई को लेकर महत्वपूर्ण सलाह जारी की है। वैज्ञानिकों ने कहा है कि जिन क्षेत्रों में खेतों में पर्याप्त पानी भर गया है और लगातार वर्षा हो रही है, वहां किसान **लेही विधि** से धान की बुआई करें।
कृषि विशेषज्ञों के अनुसार इस वर्ष अल नीनो के प्रभाव के कारण मानसून बस्तर क्षेत्र में करीब 10 दिन की देरी से पहुंचा, लेकिन अब प्रदेश के अधिकांश हिस्सों में सामान्य वर्षा हो चुकी है। 8 जुलाई तक पूरे राज्य में व्यापक बारिश होने की संभावना है। ऐसे में जिन किसानों के पास धान की नर्सरी तैयार है, वे मचाई कर रोपाई शुरू करें, जबकि नर्सरी उपलब्ध नहीं होने पर अंकुरित बीजों की ड्रम सीडर या छिटकवा विधि से लेही पद्धति में बुआई करें।
वैज्ञानिकों ने सलाह दी है कि किसान शीघ्र और मध्यम अवधि (125–130 दिन) में पकने वाली धान की किस्मों का चयन करें। बीजों की बुआई से पहले कार्बेन्डाजिम जैसे कवकनाशी और जैव उर्वरकों से उपचार करना आवश्यक है, जिससे रोगों की रोकथाम के साथ फसल को पर्याप्त पोषक तत्व मिल सकें।
विशेषज्ञों के अनुसार हरेली तिहार (12 अगस्त) तक धान की बुआई और रोपाई करने पर उत्पादन में अधिक नुकसान नहीं होगा। सीधी बुआई करने वाले किसान 15 जुलाई तक बुआई पूरी करें, जबकि रोपा एवं बियासी पद्धति अपनाने वाले किसान 30 जुलाई तक रोपाई का कार्य पूरा कर लें।
कृषि वैज्ञानिकों ने बताया कि लगातार वर्षा की स्थिति में लेही विधि सबसे उपयुक्त है। इसमें खेत की अच्छी तरह मचाई कर 24 से 30 घंटे में अंकुरित किए गए बीजों को ड्रम सीडर या छिटकवा विधि से बोया जाता है। इससे पौधों का विकास बेहतर होता है और खेती अधिक प्रभावी बनती है।
विशेषज्ञों ने किसानों को खरपतवार नियंत्रण पर भी विशेष ध्यान देने की सलाह दी है। उन्होंने कहा कि बुआई के बाद पहले 40 दिनों तक खेत को खरपतवार मुक्त रखना अत्यंत आवश्यक है, क्योंकि समय पर नियंत्रण नहीं होने पर उत्पादन में 50 प्रतिशत तक कमी आ सकती है। आवश्यकता अनुसार हाथ से निंदाई, पैडी वीडर या वैज्ञानिकों की सलाह से अनुशंसित खरपतवारनाशकों का उपयोग किया जा सकता है।
कृषि विभाग ने बताया कि प्राथमिक सहकारी समितियों में यूरिया, डीएपी, एनपीके, सिंगल सुपर फॉस्फेट और पोटाश सहित पर्याप्त मात्रा में उर्वरकों का भंडारण किया जा चुका है। किसानों को संतुलित उर्वरक उपयोग करने तथा किसी भी तकनीकी समस्या के समाधान के लिए निकटतम कृषि विज्ञान केंद्र, कृषि अनुसंधान केंद्र या कृषि विभाग से संपर्क करने की सलाह दी गई है।
