इजराइल। इजराइल के आम चुनावों के शुरुआती नतीजों ने देश की राजनीति में नई अनिश्चितता पैदा कर दी है। मतगणना के दौरान किसी भी गठबंधन को स्पष्ट बहुमत मिलता नजर नहीं आ रहा है। ऐसे में लंबे समय तक प्रधानमंत्री रहे बेंजामिन नेतन्याहू के सामने सत्ता बचाने की चुनौती खड़ी हो गई है। दूसरी ओर, अरब नेतृत्व वाली पार्टियों के बेहतर प्रदर्शन ने उन्हें सरकार गठन की प्रक्रिया में निर्णायक भूमिका में ला खड़ा किया है।
चुनाव के शुरुआती रुझानों के मुताबिक, नेतन्याहू की लिकुड पार्टी और उनके सहयोगी दल बहुमत के जरूरी आंकड़े से पीछे हैं। वहीं, विपक्षी गठबंधन भी अपने दम पर सरकार बनाने की स्थिति में नहीं दिख रहा है। इजराइल की 120 सदस्यीय संसद नेसेट में सरकार बनाने के लिए कम से कम 61 सीटों का समर्थन जरूरी है।
लिकुड का समर्थन घटा, विपक्ष के सामने भी चुनौती
केंद्रीय चुनाव समिति के अनुसार, 89.8 प्रतिशत मतों की गिनती के बाद नेतन्याहू के गठबंधन को लगभग 53 सीटें मिलने का अनुमान था। वहीं, पूर्व सैन्य प्रमुख गादी आइसेनकोट के नेतृत्व वाले विपक्षी गुट को करीब 48 सीटें मिलने की संभावना जताई गई। मुख्य रूप से अरब नेतृत्व वाली दो पार्टियों को मिलाकर लगभग 19 सीटें मिलने का अनुमान सामने आया, जिससे सरकार गठन में उनकी भूमिका अहम हो गई।
इन आंकड़ों के आधार पर दोनों प्रमुख राजनीतिक खेमे बहुमत से पीछे हैं। हालांकि, सैन्य कर्मियों, राजनयिकों और अन्य अनुपस्थित मतदाताओं के लगभग पांच लाख वोटों की गिनती बाकी होने के कारण अंतिम तस्वीर बदलने की संभावना बनी हुई थी।
अरब पार्टियों के साथ गठबंधन पर मतभेद
अरब नेतृत्व वाली पार्टियों के बेहतर प्रदर्शन के बावजूद यह स्पष्ट नहीं है कि नेतन्याहू के विरोधी दल सरकार बनाने के लिए उनके साथ औपचारिक गठबंधन करने को तैयार होंगे या नहीं। इजराइल में अरब नागरिकों की राजनीतिक भागीदारी और फिलिस्तीनी अधिकारों से जुड़े मुद्दे लंबे समय से संवेदनशील रहे हैं।
नेतन्याहू ने अरब नेतृत्व वाली पार्टियों के साथ गठबंधन की संभावना को खारिज किया है। उन्होंने ऐसी सरकार के गठन को लेकर भी चेतावनी दी, जिसमें इन दलों की भागीदारी हो सकती है। दूसरी ओर, इन पार्टियों ने भी नेतन्याहू के साथ गठबंधन करने से इनकार किया है।
विपक्ष के प्रमुख नेता गादी आइसेनकोट ने हालांकि कुछ शर्तों के साथ अरब पार्टियों के सहयोग की संभावना खुली रखी है। इनमें इजराइल को यहूदी राज्य के रूप में मान्यता देने और हमास को चरमपंथी संगठन मानने जैसी शर्तें शामिल बताई गई हैं। इसके बावजूद, इस तरह के गठबंधन को लेकर विपक्ष के भीतर मतभेद बने हुए हैं।
नेतन्याहू के सहयोगियों को भी नुकसान
चुनावी नतीजों से संकेत मिलता है कि नेतन्याहू की लिकुड पार्टी को 2022 के चुनावों की तुलना में समर्थन में कमी का सामना करना पड़ा है। उनके धुर-दक्षिणपंथी सहयोगियों को लेकर असंतोष भी चुनाव में एक अहम मुद्दा रहा। इसके अलावा, कुछ अति-रूढ़िवादी यहूदी पुरुषों को सैन्य सेवा से छूट दिए जाने के मुद्दे पर भी जनता के बीच नाराजगी देखी गई।
नेतन्याहू के सहयोगी और राष्ट्रीय सुरक्षा मंत्री इतामार बेन-गवीर की पार्टी को भी समर्थन में नुकसान होने का अनुमान जताया गया। बेन-गवीर की फिलिस्तीनियों के प्रति टिप्पणियों और कठोर रुख को लेकर पहले भी विवाद होते रहे हैं।
हालांकि, शुरुआती नतीजों के बावजूद नेतन्याहू की पार्टी के सबसे बड़े दल के रूप में उभरने की संभावना बनी हुई थी। ऐसे में राष्ट्रपति इसाक हर्ज़ोग उन्हें सरकार बनाने के लिए आमंत्रित कर सकते हैं, लेकिन सबसे बड़ी पार्टी के नेता को ही यह जिम्मेदारी देना उनके लिए कानूनी रूप से अनिवार्य नहीं है।
राष्ट्रपति ने दोबारा चुनाव से बचने की अपील की
इजराइल के राष्ट्रपति इसाक हर्ज़ोग ने राजनीतिक दलों से अपील की है कि देश को एक और चुनाव की स्थिति से बचाने के लिए हर संभव प्रयास किया जाए। उनका कहना है कि व्यापक मतदान के बाद जनता के फैसले का सम्मान करते हुए स्थिर सरकार बनाने की कोशिश होनी चाहिए।
यदि कोई भी नेता 61 सांसदों का समर्थन जुटाने में सफल नहीं होता है, तो देश में दोबारा चुनाव कराने की नौबत आ सकती है। इजराइल इससे पहले भी लंबे राजनीतिक गतिरोध का सामना कर चुका है। अप्रैल 2019 से नवंबर 2022 के बीच देश में पांच बार चुनाव हुए थे।
एक अन्य संभावना अल्पमत सरकार के गठन की भी है। हालांकि, ऐसी सरकार को महत्वपूर्ण विधेयकों और अन्य संसदीय कामकाज के लिए गठबंधन से बाहर के दलों का समर्थन हासिल करना होगा।
अरब नागरिकों की भूमिका पर फिर शुरू हुई बहस
अरब नेतृत्व वाली पार्टियों के प्रदर्शन ने इजराइल में राष्ट्रीय पहचान, समान अधिकारों और राजनीतिक प्रतिनिधित्व को लेकर बहस तेज कर दी है। इजराइल की आबादी में अरब नागरिकों की हिस्सेदारी लगभग 20 प्रतिशत बताई जाती है। इनमें बड़ी संख्या उन फिलिस्तीनियों के वंशजों की है, जो 1948 में इजराइल की स्थापना के बाद भी वहीं रह गए थे।
अरब नागरिकों को लंबे समय से भेदभाव और राजनीतिक अविश्वास जैसी चुनौतियों का सामना करना पड़ता रहा है। 7 अक्टूबर 2023 को हमास के हमले के बाद यह अविश्वास और गहरा हुआ, हालांकि उस हमले में मारे गए और अगवा किए गए लोगों में अरब नागरिक भी शामिल थे।
विपक्ष के नेता यायर गोलान ने अरब मतदाताओं और यहूदी मतदाताओं के बीच राजनीतिक विभाजन को समाप्त करने की जरूरत पर जोर दिया है। उनका मानना है कि अरब नेतृत्व वाली पार्टियों को राजनीतिक प्रक्रिया में शामिल करने से देश में व्यापक सहयोग का रास्ता खुल सकता है।
फिलहाल, इजराइल में सरकार गठन की तस्वीर स्पष्ट नहीं है। अंतिम चुनावी नतीजों, गठबंधन संबंधी बातचीत और अरब पार्टियों के रुख पर देश की अगली सरकार का भविष्य निर्भर करेगा। यदि राजनीतिक दल बहुमत जुटाने में नाकाम रहते हैं, तो इजराइल को एक बार फिर चुनाव का सामना करना पड़ सकता है।
