कवर्धा। कबीरधाम जिले की मैकाल पर्वतमाला की गोद में स्थित भोरमदेव मंदिर अपनी भव्य वास्तुकला, अद्भुत शिल्पकला और धार्मिक महत्व के कारण देशभर में प्रसिद्ध है। भगवान शिव को समर्पित यह प्राचीन मंदिर लगभग एक हजार वर्ष पुराना माना जाता है और इसे “छत्तीसगढ़ का खजुराहो” भी कहा जाता है।
मंदिर की दीवारों पर उकेरी गई आकर्षक मूर्तियां और बारीक नक्काशी तत्कालीन कला एवं संस्कृति की समृद्ध परंपरा को दर्शाती हैं। प्राकृतिक सौंदर्य से घिरे इस मंदिर में वर्षभर श्रद्धालुओं और पर्यटकों का आना-जाना लगा रहता है। विशेष रूप से महाशिवरात्रि और सावन माह में यहां बड़ी संख्या में भक्त दर्शन के लिए पहुंचते हैं।
भोरमदेव मंदिर परिसर में स्थित मदवा महल और छेरकी महल भी ऐतिहासिक दृष्टि से महत्वपूर्ण हैं। यह पूरा क्षेत्र पुरातात्विक और पर्यटन की दृष्टि से छत्तीसगढ़ की अमूल्य धरोहर माना जाता है।
राज्य सरकार द्वारा भोरमदेव क्षेत्र को पर्यटन के प्रमुख केंद्र के रूप में विकसित किया जा रहा है, जिससे यहां आने वाले पर्यटकों को बेहतर सुविधाएं उपलब्ध हो सकें। धार्मिक आस्था, ऐतिहासिक महत्व और प्राकृतिक सुंदरता का अद्भुत संगम भोरमदेव मंदिर को छत्तीसगढ़ के प्रमुख पर्यटन स्थलों में शामिल करता है।
