दुर्ग, 30 मई 2026। छत्तीसगढ़ के Chhattisgarh Swami Vivekanand Technical University में सामने आए पीएचडी फीस घोटाले के मामले में नेवई पुलिस ने जांच पूरी कर आरोपी कर्मचारी सुनील कुमार प्रसाद के खिलाफ न्यायालय में चालान पेश कर दिया है। आरोपी पर शोधार्थियों से वसूली गई लाखों रुपये की फीस का गबन कर उसे ऑनलाइन बेटिंग, शेयर ट्रेडिंग और निजी खर्चों में इस्तेमाल करने का आरोप है।
शिकायत के बाद हुआ खुलासा
मामला नवंबर 2025 में सामने आया, जब कई पीएचडी शोधार्थियों ने शिकायत की कि फीस जमा करने के बावजूद उनकी एंट्री विश्वविद्यालय के पोर्टल पर दर्ज नहीं हुई। शिकायत मिलने पर विश्वविद्यालय प्रबंधन ने एक अंतरिम जांच समिति गठित की।
जांच में पता चला कि पीएचडी शाखा में दैनिक मानदेय पर कार्यरत सुनील कुमार प्रसाद छात्रों से 30-30 हजार रुपये लेकर फर्जी फीस रसीद जारी कर रहा था और राशि विश्वविद्यालय के खाते में जमा नहीं की जा रही थी।
निजी खातों में जमा करवाई जा रही थी फीस
पुलिस जांच में कई विद्यार्थियों ने बताया कि उन्होंने नकद और ऑनलाइन माध्यम से फीस जमा की थी, लेकिन रकम आरोपी के निजी बैंक खातों में ट्रांसफर करवाई जा रही थी। प्रारंभिक जांच में 9 लाख 44 हजार 500 रुपये के गबन की पुष्टि हुई, जिसके बाद 2 फरवरी 2026 को नेवई थाने में एफआईआर दर्ज की गई।
जांच के दौरान आरोपी के बैंक खातों में करीब 1.80 करोड़ रुपये के लेनदेन का भी खुलासा हुआ, जिसके बाद पुलिस ने वित्तीय लेनदेन की विस्तृत जांच शुरू की।
बैंक रिकॉर्ड और डिजिटल साक्ष्यों के आधार पर जांच
भिलाई नगर के सीएसपी सत्य प्रकाश तिवारी के अनुसार, बैंक रिकॉर्ड, विद्यार्थियों के बयान, डिजिटल ट्रांजेक्शन और दस्तावेजी साक्ष्यों के आधार पर मामले की गहन जांच की गई। पुलिस ने वित्तीय और तकनीकी दोनों पहलुओं की बारीकी से पड़ताल की है।
ऑनलाइन बेटिंग और शेयर ट्रेडिंग में खर्च की रकम
पुलिस के अनुसार, 6 फरवरी को जमानत खारिज होने के बाद आरोपी को 9 फरवरी को रिमांड पर लिया गया। पूछताछ में सामने आया कि कथित रूप से गबन की गई राशि का बड़ा हिस्सा ड्रीम 11 और अन्य ऑनलाइन बेटिंग प्लेटफॉर्म पर खर्च किया गया। इसके अलावा आरोपी शेयर बाजार में भी लगातार निवेश कर रहा था।
पत्नी के खातों की भी जांच
जांच एजेंसियों ने आरोपी की पत्नी के बैंक खातों और ऑनलाइन लेनदेन की भी जांच की। पूछताछ के दौरान आरोपी ने कुछ पूर्व अधिकारियों के नाम भी लिए, लेकिन अब तक किसी अधिकारी तक रकम पहुंचने के प्रमाण नहीं मिले हैं।
पुलिस का कहना है कि आरोपी फर्जी दस्तावेज तैयार कर शोधार्थियों को गुमराह करता था। मामले की जांच पूरी होने के बाद अब प्रकरण की सुनवाई न्यायालय में होगी।
