नई दिल्ली। एच-1बी वीजा फीस में भारी वृद्धि को लेकर भारत और अमेरिका के बीच तनाव बढ़ गया है। राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के हालिया फैसले ने भारतीय आईटी पेशेवरों को चिंतित कर दिया है, जो इस वीजा कार्यक्रम के सबसे बड़े लाभार्थी हैं। विदेश मंत्रालय ने कहा है कि दोनों देशों के बीच कुशल प्रतिभा की आवाजाही इनोवेशन और आर्थिक विकास के लिए महत्वपूर्ण है, लेकिन नए शुल्क से परिवारों पर मानवीय प्रभाव पड़ सकता है। क्या ट्रंप प्रशासन झुक सकता है? सरकार का कहना है कि चर्चाएं जारी हैं और उचित संतुलन की उम्मीद है।
ट्रंप का फैसला और इसका असर
ट्रंप प्रशासन ने 19 सितंबर 2025 को एच-1बी वीजा के लिए 100,000 डॉलर (करीब 88 लाख रुपये) का वार्षिक शुल्क लगाने का आदेश जारी किया, जो वर्तमान फीस से 60 गुना अधिक है। यह कदम वीजा कार्यक्रम के “दुरुपयोग” को रोकने और अमेरिकी मजदूरों की रक्षा के लिए उठाया गया बताया जा रहा है। व्हाइट हाउस का दावा है कि कंपनियां अमेरिकी कर्मचारियों को निकालकर सस्ते विदेशी श्रमिकों को हायर कर रही हैं, जिससे राष्ट्रीय सुरक्षा को खतरा हो रहा है।
भारतीय आईटी कंपनियों पर इसका सबसे बुरा असर पड़ेगा। यूएस सिटिजनशिप एंड इमिग्रेशन सर्विसेज (यूएससीआईएस) के आंकड़ों के अनुसार, वित्तीय वर्ष 2025 की पहली छमाही में अमेजन को सबसे अधिक 10,044 एच-1बी वीजा मिले, जबकि टाटा कंसल्टेंसी सर्विसेज (टीसीएस) को 5,505। कुल वीजा आवेदनों का लगभग 75% भारतीय नागरिकों का होता है, जो आईटी, स्वास्थ्य और इंजीनियरिंग जैसे क्षेत्रों में काम करते हैं। इस फीस से न केवल नए आवेदकों पर बोझ पड़ेगा, बल्कि कंपनियों की लागत बढ़ने से नौकरियां प्रभावित होंगी।
व्हाइट हाउस का स्पष्टीकरण
ट्रंप के आदेश के बाद आई चिंताओं को शांत करने के लिए व्हाइट हाउस ने स्पष्टीकरण जारी किया। इसमें कहा गया कि यह 100,000 डॉलर का शुल्क “वन-टाइम” पेमेंट है और केवल नए आवेदकों पर लागू होगा, जो अमेरिका के बाहर से आवेदन कर रहे हैं। मौजूदा वीजा धारकों या 2025 लॉटरी में भाग लेने वालों पर इसका असर नहीं पड़ेगा। यह नियम 21 सितंबर 2025 से प्रभावी हो गया है।

भारत सरकार का रुख और चल रही चर्चाएं
विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने साप्ताहिक मीडिया ब्रीफिंग में अमेरिकी गृह सुरक्षा विभाग की अधिसूचना का जिक्र किया। उन्होंने बताया कि उद्योग और हितधारकों को इस पर राय देने के लिए एक महीने का समय दिया गया है। जायसवाल ने कहा, “हम विभिन्न स्तरों पर जुड़े हुए हैं। चीजें विकसित हो रही हैं। भारतीय पक्ष का मानना है कि कुशल पेशेवरों की अमेरिका में आवाजाही से दोनों देशों को लाभ होता है।”
मंत्रालय ने जोर दिया कि भारत-अमेरिका के बीच प्रतिभा का आदान-प्रदान इनोवेशन, धन सृजन, आर्थिक विकास, प्रतिस्पर्धात्मकता और उत्पादकता में योगदान देता है। जायसवाल ने कहा, “हम इंडस्ट्री सहित सभी संबंधितों के साथ जुड़े रहना चाहते हैं। हमें उम्मीद है कि इन कारकों पर उचित ध्यान दिया जाएगा।” विदेश मंत्रालय ने चेतावनी दी कि यह फीस परिवारों को बिखेर सकती है और मानवीय परिणाम पैदा कर सकती है।
विदेश मंत्री एस. जयशंकर और वाणिज्य मंत्री पीयूष गोयल ने 22 सितंबर को न्यूयॉर्क में यूएन महासभा के दौरान अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो और व्यापार प्रतिनिधि जेमीसन ग्रीर से मुलाकात की। चर्चा का केंद्र व्यापार, टैरिफ और द्विपक्षीय संबंध थे। जायसवाल ने कहा कि पिछले कुछ महीनों से चल रही द्विपक्षीय व्यापार समझौते की बातचीत में सभी रुचि के क्षेत्र शामिल हैं।
टैरिफ पर भारत की प्रतिक्रिया
ब्रीफिंग में ट्रंप प्रशासन के 1 अक्टूबर से फार्मास्यूटिकल उत्पादों, बड़े ट्रकों और फर्नीचर पर 100% टैरिफ लगाने के प्रस्ताव पर भी सवाल उठा। जायसवाल ने कहा कि संबंधित विभाग इसकी जांच कर रहे हैं। उन्होंने जोर दिया कि ये चर्चाएं व्यापक हैं और भारत-अमेरिका संबंधों को मजबूत करने पर केंद्रित हैं।
ट्रंप झुकेंगे या नहीं?
विपक्ष ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर नरमी बरतने का आरोप लगाया है, जबकि तेलंगाना के मुख्यमंत्री रेवंत रेड्डी ने इसे “युद्ध स्तर” पर लेने की मांग की। थिंक टैंक जीटीआरआई का कहना है कि इससे अमेरिका को अधिक नुकसान होगा, क्योंकि सिलिकॉन वैली और अस्पतालों का निर्माण भारतीय प्रतिभाओं पर निर्भर है। विशेषज्ञों का मानना है कि चल रही बातचीत से संतुलित समाधान निकल सकता है, लेकिन ट्रंप की “अमेरिका फर्स्ट” नीति के आगे झुकना मुश्किल लगता है।
