रायपुर। छत्तीसगढ़ की समृद्ध जनजातीय संस्कृति और सदियों पुरानी परंपराओं के प्रतीक विश्वप्रसिद्ध बस्तर दशहरा में शामिल होने के लिए मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय को आमंत्रित किया गया है। बस्तर दशहरा समिति के प्रतिनिधिमंडल ने मुख्यमंत्री से सौजन्य मुलाकात कर उन्हें इस ऐतिहासिक सांस्कृतिक आयोजन में शामिल होने का निमंत्रण दिया। इस अवसर पर समिति के सदस्यों ने पारंपरिक पागा पहनाकर मुख्यमंत्री का सम्मान किया।
मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय ने आमंत्रण के लिए बस्तर दशहरा समिति के सदस्यों का आभार व्यक्त किया। बस्तर दशहरा छत्तीसगढ़ की सांस्कृतिक पहचान, धार्मिक आस्था और जनजातीय परंपराओं का महत्वपूर्ण प्रतीक है। अपनी विशिष्ट परंपराओं के कारण यह पर्व देश-विदेश में विशेष पहचान रखता है।
75 दिनों तक चलने वाला अनूठा सांस्कृतिक पर्व
बस्तर दशहरा देश के सबसे लंबे समय तक चलने वाले त्योहारों में शामिल है। यह उत्सव लगभग 75 दिनों तक विभिन्न धार्मिक अनुष्ठानों और पारंपरिक आयोजनों के साथ मनाया जाता है। इसकी शुरुआत सावन महीने में हरियाली अमावस्या से होती है और समापन आश्विन मास में होता है।
इस दौरान बस्तर संभाग के विभिन्न क्षेत्रों से लोग उत्सव में भाग लेते हैं। स्थानीय देवी-देवताओं की आराधना, पारंपरिक रीति-रिवाज और जनजातीय समुदायों की सामूहिक भागीदारी इस पर्व की प्रमुख विशेषताएं हैं। पीढ़ियों से चली आ रही परंपराएं आज भी इस आयोजन को विशिष्ट स्वरूप प्रदान करती हैं।
राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू को भी दिया गया आमंत्रण
बस्तर दशहरा में शामिल होने के लिए राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू को भी आमंत्रित किया गया है। जानकारी के अनुसार, केंद्रीय राज्य मंत्री तोखन साहू और छत्तीसगढ़ के संस्कृति मंत्री राजेश अग्रवाल ने नई दिल्ली में राष्ट्रपति से मुलाकात कर उन्हें इस विशिष्ट सांस्कृतिक आयोजन में शामिल होने का निमंत्रण दिया।
राष्ट्रपति को आमंत्रित किए जाने से बस्तर की जनजातीय विरासत और छत्तीसगढ़ की सांस्कृतिक परंपराओं को राष्ट्रीय स्तर पर प्रदर्शित करने का अवसर मिलेगा। यह आयोजन प्रदेश की ऐतिहासिक और सांस्कृतिक पहचान को व्यापक स्तर पर सामने लाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
बस्तर दशहरा में नहीं होता रावण दहन, मां दंतेश्वरी की आराधना है प्रमुख
देश के अन्य हिस्सों में दशहरा पर्व का प्रमुख आकर्षण रावण दहन होता है, लेकिन बस्तर दशहरा की परंपरा इससे अलग है। यहां रावण के पुतले का दहन नहीं किया जाता, बल्कि यह पर्व मुख्य रूप से आराध्य देवी मां दंतेश्वरी की पूजा-अर्चना और जनजातीय परंपराओं को समर्पित है।
इस उत्सव में देवी के प्रति श्रद्धा, पारंपरिक अनुष्ठान और स्थानीय समुदायों की सहभागिता विशेष महत्व रखती है। यही कारण है कि बस्तर दशहरा देश के अन्य दशहरा आयोजनों से अलग पहचान बनाए हुए है।
15वीं शताब्दी से जुड़ा है बस्तर दशहरा का इतिहास
ऐतिहासिक मान्यताओं के अनुसार, बस्तर दशहरा की परंपरा 15वीं शताब्दी में काकतीय वंश के शासक महाराजा पुरुषोत्तम देव के समय से जुड़ी हुई है। सदियों से आयोजित हो रहा यह पर्व आज भी बस्तर की सांस्कृतिक विरासत और जनजातीय जीवन परंपराओं को जीवंत बनाए हुए है।
मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय को मिले आमंत्रण और राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू को भेजे गए निमंत्रण से इस आयोजन का महत्व एक बार फिर सामने आया है। बस्तर दशहरा न केवल धार्मिक आस्था का पर्व है, बल्कि यह छत्तीसगढ़ की विशिष्ट सांस्कृतिक पहचान, सामाजिक एकजुटता और समृद्ध परंपराओं का भी प्रतीक है।
