बेंजामिन नेतन्याहू ने दावा किया है कि ईरान की रणनीतिक सैन्य क्षमताएं लगभग पूरी तरह ध्वस्त हो चुकी हैं। उनके अनुसार, इजरायल और संयुक्त राज्य अमेरिका द्वारा किए गए लगातार हवाई और मिसाइल हमलों से ईरान की मिसाइल, ड्रोन, वायु रक्षा और परमाणु ढांचे को भारी नुकसान पहुंचा है।
खुफिया सूत्रों के मुताबिक, इन हमलों ने ईरान की लंबी दूरी तक निरंतर हमला करने की क्षमता को गंभीर रूप से कमजोर कर दिया है, हालांकि सीमित स्तर पर जवाबी हमले की संभावना अभी भी बनी हुई है।
युद्ध से पहले ईरान के पास अनुमानतः 410 से 500 बैलिस्टिक मिसाइल लॉन्चर थे, जिनमें से लगभग 75 प्रतिशत अब नष्ट या निष्क्रिय हो चुके हैं। वर्तमान में केवल 100 से 180 लॉन्चर ही सक्रिय माने जा रहे हैं, जिससे बड़े पैमाने पर हमले की क्षमता काफी सीमित हो गई है।
मिसाइल भंडार पर भी बड़ा असर पड़ा है। पहले जहां 2,500 से 3,000 मिसाइलें होने का अनुमान था, वहीं अब 500 से अधिक के उपयोग और सैकड़ों के नष्ट होने के बाद लॉन्च दर में 90 प्रतिशत से अधिक गिरावट दर्ज की गई है। विशेषज्ञों का आकलन है कि ईरान की बैलिस्टिक क्षमता अब अपने पूर्व स्तर के मात्र 8-10 प्रतिशत तक सिमट गई है।
ड्रोन क्षमताओं में भी भारी गिरावट आई है। युद्ध के बाद 2,000 से अधिक ड्रोन नष्ट हो चुके हैं और संचालन दर 83 से 95 प्रतिशत तक घट गई है। कई एयरबेस और कमांड सेंटर क्षतिग्रस्त होने के कारण अब सीमित और कम क्षमता वाले ड्रोन का उपयोग किया जा रहा है।
सैन्य अभियान के तहत “ऑपरेशन राइजिंग लायन” के जरिए ईरान के सैन्य-औद्योगिक ढांचे को निशाना बनाया गया। मिसाइल और ड्रोन निर्माण इकाइयों, भंडारण केंद्रों और सप्लाई नेटवर्क को व्यवस्थित रूप से तबाह किया गया, जिससे पुनर्निर्माण की क्षमता पर गहरा असर पड़ा है।
हमले ईरान के परमाणु ढांचे तक भी पहुंचे। नतान्ज़ और फोर्डो जैसे प्रमुख परमाणु केंद्रों में सेंट्रीफ्यूज, बिजली तंत्र और ऑपरेशनल सुविधाएं बुरी तरह क्षतिग्रस्त हुई हैं। इसके अलावा इस्फ़हान यूरेनियम रूपांतरण केंद्र और तालेघन परीक्षण स्थल को भी निशाना बनाया गया है। खुफिया आकलन के अनुसार, इन हमलों से ईरान के परमाणु कार्यक्रम को पुनर्जीवित करने में वर्षों का समय लग सकता है।
हालांकि इन दावों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हो सकी है, लेकिन मौजूदा घटनाक्रम ने मध्य-पूर्व में तनाव को और बढ़ा दिया है।
