तिल्दा : तिल्दा स्थित अडानी पावर रायखेड़ा संयंत्र में 17 दिनों तक चली हड़ताल समाप्त होने के बाद भी मजदूरों की नाराजगी थमने का नाम नहीं ले रही है। करीब 1600 कामगार और उनके परिवार हड़ताल को बिना लक्ष्य प्राप्ति के खत्म किए जाने से खुद को ठगा हुआ महसूस कर रहे हैं। मजदूरों का कहना है कि लंबे संघर्ष के बावजूद उनकी अधिकांश जायज मांगों को नजरअंदाज कर दिया गया।
मजदूरों के अनुसार, 17 दिनों तक चली हड़ताल से प्रबंधन पर दबाव साफ नजर आने लगा था। कामगारों का दावा है कि यदि हड़ताल दो दिन और जारी रहती, तो प्रबंधन को अधिकांश मांगें मानने पर मजबूर होना पड़ता। लेकिन अचानक हड़ताल समाप्त करने के फैसले ने पूरे आंदोलन पर सवाल खड़े कर दिए हैं।
यूनियन नेतृत्व पर उठे गंभीर सवाल
कामगारों ने एटक (AITUC) के नेतृत्व को लेकर गहरी नाराजगी जताई है। आरोप है कि रायपुर में हुई अहम बैठक की जानकारी आम मजदूरों से छुपाई गई और कुछ चुनिंदा पदाधिकारियों ने ही हड़ताल समाप्त करने का फैसला ले लिया। मजदूरों का कहना है कि यह निर्णय सामूहिक सहमति के बिना लिया गया, जिससे भरोसा टूट गया।
14 मांगों में सिर्फ 3 पर सहमति
हड़ताल के दौरान मजदूरों ने 14 सूत्रीय मांग पत्र सौंपा था, लेकिन अंततः केवल 3 मांगों पर ही सहमति बनी। इसमें महज 300 रुपये वेतन वृद्धि और यूनिफॉर्म देने का आश्वासन शामिल है। मजदूरों का कहना है कि यह बढ़ोतरी नाकाफी है और इससे उनकी आर्थिक स्थिति में कोई ठोस सुधार नहीं होगा।
कामगारों ने इसे “नौ दिन चले अढ़ाई कोस” जैसी स्थिति बताया है।
दबाव में लिया गया फैसला?
मजदूरों का आरोप है कि सरकार, प्रशासन और कुछ जनप्रतिनिधियों के दबाव में आकर यूनियन नेतृत्व ने समझौता किया, जिससे मजदूरों के हक पर कुठाराघात हुआ। कामगारों का कहना है कि जिन लोगों पर उन्होंने भरोसा किया, वही उन्हें “भीड़ दिखाकर ठगने” वाले साबित हुए।
न्यायालय का नोटिस और आगे की राह
मामले में न्यायालय की ओर से 6 महीने तक किसी भी तरह की हड़ताल न करने का नोटिस जारी किया गया है। ऐसे में मजदूर अब मजबूरी में इस अवधि के बीतने का इंतजार कर रहे हैं।
हालांकि, कामगारों ने साफ कर दिया है कि 6 महीने पूरे होते ही वे अपनी जायज मांगों को लेकर फिर से आंदोलन करेंगे।
मजदूरों का कहना है कि यह संघर्ष अभी खत्म नहीं हुआ है, बल्कि केवल अस्थायी रूप से थमा है।
