यूनिवर्सिटी ग्रांट्स कमीशन (UGC) द्वारा उच्च शिक्षण संस्थानों में जाति-आधारित भेदभाव रोकने के लिए लागू किए गए संशोधित नियमों को लेकर देशभर में राजनीतिक और सामाजिक तापमान तेज़ी से बढ़ता जा रहा है। जहां एक ओर सरकार इन नियमों को समानता की दिशा में बड़ा कदम बता रही है, वहीं दूसरी ओर इसे लेकर ‘सवर्ण बनाम अन्य वर्ग’ की बहस गहराती जा रही है।
इस विवाद में अब प्रख्यात कवि और वक्ता कुमार विश्वास भी खुलकर सामने आ गए हैं। उन्होंने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X (पूर्व में ट्विटर) पर दिवंगत कवि रमेश रंजन की एक कविता साझा करते हुए UGC के नए नियमों का विरोध दर्ज कराया।
कुमार विश्वास ने लिखा—
“चाहे तिल लो या ताड़ लो राजा,
राई लो या पहाड़ लो राजा,
मैं अभागा ‘सवर्ण’ हूँ मेरा,
रोंया-रोंया उखाड़ लो राजा।”
इसके साथ उन्होंने #UGC_RollBack हैशटैग का इस्तेमाल किया, जो इन नियमों के खिलाफ चल रहे विरोध का प्रतीक बनता जा रहा है।
क्या हैं UGC के नए नियम?
UGC द्वारा यह संशोधन रोहित वेमुला मामले की सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के बाद किया गया। कोर्ट ने उच्च शिक्षण संस्थानों में जाति-आधारित भेदभाव को रोकने के लिए सख्त और प्रभावी तंत्र बनाने को कहा था।
इसके तहत अब सभी विश्वविद्यालयों और कॉलेजों में Equality Committee (समानता समिति) का गठन अनिवार्य कर दिया गया है। इस समिति के सामने अब SC, ST और OBC वर्ग के छात्र जातिगत भेदभाव की शिकायत दर्ज करा सकेंगे। पहले यह अधिकार केवल SC और ST छात्रों तक सीमित था।
विवाद की जड़ क्या है?
विरोध करने वालों की मुख्य आपत्तियां तीन बिंदुओं पर केंद्रित हैं—
- सवर्ण प्रतिनिधित्व अनिवार्य नहीं
नई समिति में SC, ST और OBC वर्ग से प्रतिनिधित्व अनिवार्य किया गया है, लेकिन सवर्ण वर्ग के लिए ऐसा कोई प्रावधान नहीं है। इसे कई संगठन संवैधानिक समानता के खिलाफ बता रहे हैं। - झूठी शिकायत पर दंड का प्रावधान हटाया गया
पुराने नियमों में निराधार या झूठी शिकायत करने पर कार्रवाई का प्रावधान था, जिसे नई गाइडलाइंस से हटा दिया गया है। विरोधियों का कहना है कि इससे नियमों का दुरुपयोग हो सकता है। - एकतरफा अपराधी की धारणा
प्रदर्शनकारियों का आरोप है कि नए नियम यह संकेत देते हैं कि केवल सवर्ण ही आरोपी हो सकते हैं, जबकि अन्य वर्गों को हमेशा पीड़ित मान लिया गया है।
प्रदर्शनकारियों की मांगें
UGC नियमों के खिलाफ प्रदर्शन कर रहे समूहों की मांग है कि—
- भेदभाव के मामलों में जाति नहीं, अपराध को आधार बनाया जाए
- सवर्ण छात्रों को भी अपमानजनक टिप्पणियों और मानसिक उत्पीड़न से सुरक्षा मिले
- झूठी शिकायत दर्ज कराने पर कड़ी सजा का प्रावधान फिर से जोड़ा जाए
विपक्ष भी मैदान में
इस मुद्दे पर राजनीतिक बयानबाज़ी भी तेज़ हो गई है। समाजवादी पार्टी के सांसद जियाउर रहमान बर्क ने कहा कि
“अगर सरकार भेदभावपूर्ण कानून लाती है, तो उसका विरोध संसद के भीतर और सड़कों पर दोनों जगह किया जाएगा।”
आगे क्या?
UGC के नए नियमों पर बढ़ता विरोध अब सिर्फ शैक्षणिक बहस नहीं रह गया है, बल्कि यह सामाजिक और राजनीतिक मुद्दे का रूप ले चुका है। आने वाले दिनों में सरकार और UGC पर इन नियमों में संशोधन का दबाव और बढ़ सकता है।
