संभाजी महाराज (1657-1689) मराठा साम्राज्य के दूसरे छत्रपति थे और वे छत्रपति शिवाजी महाराज के पुत्र थे। वे एक महान योद्धा, कुशल प्रशासक और हिंदवी स्वराज्य के दृढ़ रक्षक थे। उन्होंने अपने छोटे से शासनकाल में मुगलों, पुर्तगालियों और अन्य आक्रमणकारियों के खिलाफ वीरतापूर्ण संघर्ष किया।
संभाजी महाराज का प्रारंभिक जीवन
जन्म: 14 मई 1657, पुरंदर किला, पुणे, महाराष्ट्र
पिता: छत्रपति शिवाजी महाराज
माता: सईबाई
पत्नी: येसुबाई
पुत्र: शाहू महाराज
संभाजी महाराज बचपन से ही बहादुर और कुशाग्र बुद्धि के थे। उनकी माता सईबाई का निधन उनके बचपन में ही हो गया था। शिवाजी महाराज ने उनका पालन-पोषण अपनी पत्नी सोयराबाई और गुरु रामदास स्वामी के संरक्षण में किया। संभाजी को संस्कृत, मराठी, हिंदी और फारसी भाषाओं का गहरा ज्ञान था। वे घुड़सवारी, तलवारबाजी और युद्धकला में भी निपुण थे।
संभाजी महाराज का युद्ध कौशल और शासन
शिवाजी महाराज की मृत्यु के बाद 1681 में संभाजी महाराज मराठा साम्राज्य के छत्रपति बने। उनकी शासन शैली दृढ़, रणनीतिक और युद्धकला में निपुण थी।
मुख्य युद्ध और संघर्ष
- मुगलों के खिलाफ संघर्ष:
- औरंगजेब ने मराठा साम्राज्य को खत्म करने के लिए लगातार हमले किए।
- संभाजी महाराज ने 1681-1689 के दौरान औरंगजेब की विशाल सेना को कई बार पराजित किया।
- वे छापामार युद्ध के उस्ताद थे और उन्होंने औरंगजेब को महाराष्ट्र में टिकने नहीं दिया।
- पुर्तगालियों और अंग्रेजों के खिलाफ संघर्ष:
- संभाजी महाराज ने पश्चिमी तट पर पुर्तगालियों के किले ध्वस्त कर दिए।
- उन्होंने अंग्रेजों को भी कड़ी चुनौती दी और मराठा नौसेना को मजबूत किया।
- गोलकुंडा और बीजापुर से गठबंधन:
- उन्होंने दक्षिण भारत के गोलकुंडा और बीजापुर के सुल्तानों से रणनीतिक गठबंधन किया।
- इससे मराठों की शक्ति और बढ़ गई।
संभाजी महाराज की गिरफ्तारी और बलिदान
1689 में गद्दार गणोजी शिर्के की साजिश के कारण संभाजी महाराज को मुगलों ने पकड़ लिया। औरंगजेब ने उन्हें इस्लाम कबूल करने का प्रस्ताव दिया, जिसे उन्होंने दृढ़ता से ठुकरा दिया।
- 40 दिनों तक संभाजी महाराज को क्रूरतम यातनाएं दी गईं।
- 11 मार्च 1689 को औरंगजेब ने उनकी हत्या करवा दी।
- उनकी हत्या के बाद भी मराठा सेना ने मुगलों के खिलाफ संघर्ष जारी रखा और अंततः हिंदवी स्वराज्य की रक्षा हुई।
संभाजी महाराज की विरासत
- संभाजी महाराज ने धर्म और मातृभूमि की रक्षा के लिए प्राण न्यौछावर कर दिए।
- उनकी वीरता ने मराठा साम्राज्य को नई शक्ति दी, जिसका नेतृत्व आगे चलकर राजाराम और शाहू महाराज ने किया।
- महाराष्ट्र में संभाजी महाराज को “धर्मवीर” की उपाधि दी जाती है।
- उनके बलिदान के कारण ही मराठों ने मुगलों को पराजित किया और स्वतंत्र हिंदवी स्वराज्य को आगे बढ़ाया।
निष्कर्ष
संभाजी महाराज साहस, बलिदान और राष्ट्रभक्ति का प्रतीक थे। उन्होंने अपने जीवन को धर्म, संस्कृति और स्वराज्य की रक्षा के लिए समर्पित कर दिया। उनका बलिदान भारतीय इतिहास में अमर रहेगा।