माँ दंतेश्वरी देवी बस्तर (छत्तीसगढ़) की आराध्य देवी मानी जाती हैं और उन्हें शक्ति की अधिष्ठात्री देवी के रूप में पूजा जाता है। माँ दंतेश्वरी की कहानी लोककथाओं, इतिहास और धार्मिक विश्वासों का मिश्रण है, जो बस्तर के जनजीवन, संस्कृति और परंपराओं में गहराई से रची-बसी है।
माँ दंतेश्वरी की पौराणिक कथा
माँ दंतेश्वरी को देवी सती का एक रूप माना जाता है। पौराणिक कथा के अनुसार, जब दक्ष प्रजापति ने यज्ञ में भगवान शिव का अपमान किया, तो सती ने हवन कुंड में कूदकर आत्मदाह कर लिया। इस घटना से शिव अत्यंत क्रोधित हुए और उन्होंने सती के शरीर को लेकर तांडव शुरू किया। इस तांडव को शांत करने के लिए भगवान विष्णु ने अपने सुदर्शन चक्र से सती के शरीर को कई टुकड़ों में काटा। जिन-जिन स्थानों पर सती के अंग गिरे, वे स्थान शक्ति पीठ कहलाए।
कहा जाता है कि दंतेवाड़ा में सती के दांत गिरे थे, इसलिए इस स्थान का नाम दंतेवाड़ा पड़ा और यहाँ की देवी को माँ दंतेश्वरी कहा गया।
बस्तर और माँ दंतेश्वरी का संबंध
माँ दंतेश्वरी बस्तर रियासत की कुलदेवी मानी जाती हैं। बस्तर के राजवंशों ने उन्हें अपनी आराध्य देवी के रूप में पूजा और हर साल उनके सम्मान में बस्तर दशहरा का आयोजन करते हैं।
बस्तर दशहरा भारत का सबसे लंबा त्योहार माना जाता है (75 दिन तक चलता है), और इसकी मुख्य देवी माँ दंतेश्वरी होती हैं। इस पर्व में आदिवासी समाज की विशेष भूमिका होती है। माँ की रथ यात्रा, पारंपरिक नृत्य, अनुष्ठान और जनसमागम इसे खास बनाते हैं।
मंदिर
माँ दंतेश्वरी का प्रमुख मंदिर दंतेवाड़ा ज़िले में स्थित है। यह मंदिर 14वीं शताब्दी में बना माना जाता है और यह बस्तर क्षेत्र के प्रमुख धार्मिक स्थलों में से एक है। मंदिर की स्थापत्य शैली और मूर्ति की भव्यता लोक आस्था का केंद्र है।
माँ दंतेश्वरी के अन्य नाम और स्वरूप
- उन्हें शक्ति का स्वरूप माना जाता है।
- वे रक्षक देवी हैं — बस्तर क्षेत्र के लोग मानते हैं कि माँ दंतेश्वरी उन्हें बुरी शक्तियों से बचाती हैं।
- आदिवासी समाज में उन्हें धरती और प्रकृति की देवी के रूप में भी पूजा जाता है।
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