Premanand Ji Maharaj: नई दिल्ली। यह प्रश्न अक्सर साधकों के मन में उठता है कि जब गृहस्थ जीवन में रहते हुए भी मोक्ष की प्राप्ति संभव है, तो फिर कुछ लोग सन्यास का मार्ग क्यों चुनते हैं। इस गहन जिज्ञासा का उत्तर प्रेमानंद जी महाराज ने अत्यंत सहज, किंतु गहरे आध्यात्मिक भाव के साथ दिया है। उनके अनुसार ईश्वर ने सृष्टि को एकरूप नहीं, बल्कि भिन्न-भिन्न स्वभाव, प्रवृत्तियों और योग्यताओं के अनुरूप रचा है। इसी विविधता के संतुलन के लिए प्रभु ने जीवन के दो प्रमुख मार्ग बनाए हैं प्रवृत्ति मार्ग और निवृत्ति मार्ग।
निवृत्ति मार्ग (सन्यास): समष्टि कल्याण का साधन
प्रेमानंद जी महाराज बताते हैं कि सन्यास केवल व्यक्तिगत मोक्ष की साधना नहीं है, बल्कि यह समाज और समष्टि के कल्याण का भी माध्यम है। एक सच्चा सन्यासी, जो पूर्ण रूप से ईश्वर में स्थित हो जाता है, अपने तप, त्याग और साधना से असंख्य लोगों को दिशा दे सकता है।
सन्यासी जीवन में सांसारिक बंधन नहीं होते न परिवार का पालन, न आजीविका की चिंता। उसका एकमात्र लक्ष्य होता है निरंतर नाम-स्मरण, भजन और भगवद्-चिंतन। प्रभु ने यह मार्ग इसलिए बनाया ताकि कुछ लोग अपना संपूर्ण मानसिक और आध्यात्मिक बल ईश्वर को समर्पित कर गुरु और मार्गदर्शक के रूप में समाज का पथ प्रशस्त कर सकें।
प्रवृत्ति मार्ग (गृहस्थ): संघर्ष में छिपी महान साधना
गृहस्थ जीवन अपने आप में एक कठोर तपस्या है। परिवार, जिम्मेदारियां, आर्थिक दबाव और सामाजिक दायित्वों के बीच ईश्वर-स्मरण बनाए रखना आसान नहीं होता। मन पूजा में बैठते ही अनेक चिंताओं में उलझ जाता है।
इसी संदर्भ में देवर्षि नारद और घी से भरे पात्र की कथा उल्लेखनीय है। प्रभु ने नारद जी से कहा कि सिंहासन की परिक्रमा करते हुए पात्र से एक भी बूंद न गिरे। नारद जी पूरे ध्यान से पात्र संभालते रहे और प्रभु का नाम तक स्मरण न कर सके। तब भगवान ने समझाया कि जो गृहस्थ इतनी जिम्मेदारियों के बीच भी ईश्वर का स्मरण कर लेता है, वही अत्यंत श्रेष्ठ भक्त है।

दोनों मार्गों का पवित्र सामंजस्य
निवृत्ति और प्रवृत्ति मार्ग परस्पर विरोधी नहीं, बल्कि एक-दूसरे के पूरक हैं। गृहस्थ अपने श्रम, सेवा और दान से सन्यासी जीवन को संबल देता है, जबकि सन्यासियों के तप और आशीर्वाद से गृहस्थ को आध्यात्मिक शक्ति प्राप्त होती है।
प्रेमानंद जी महाराज कहते हैं कि ईश्वर ने जिस अवस्था में हमें रखा है, वहीं रहकर यदि श्रद्धा, ईमानदारी और भक्ति से जीवन जिया जाए, तो दोनों मार्ग अंततः उसी परम लक्ष्य मोक्ष की ओर ले जाते हैं।
एक सुंदर उपमा
आध्यात्मिक यात्रा एक विशाल महासागर के समान है। सन्यासी उस प्रकाशस्तंभ की तरह है, जो स्वयं स्थिर रहकर दूसरों को दिशा दिखाता है। वहीं गृहस्थ एक मजबूत जहाज की तरह है, जो अनेक यात्रियों को लेकर संसार की लहरों से गुजरता है। दिशा यदि ईश्वर की ओर हो, तो मंज़िल अवश्य प्राप्त होती है।
