देश की आर्थिक राजधानी मुंबई की पहचान और जनसांख्यिकीय संरचना (Demographics) को लेकर राजनीतिक बहस तेज होती जा रही है। आगामी 2026 बीएमसी चुनाव से पहले शहर का भविष्य, शहरी नियोजन और वोट-बैंक की राजनीति एक बार फिर केंद्र में आ गई है। चुनावी माहौल के बीच यह सवाल उठने लगा है कि क्या सत्ता की राजनीति में मुंबई का मूल स्वरूप बदल रहा है।
विवाद के केंद्र में विपक्षी गठबंधन महाविकास आघाड़ी (MVA) है, जिस पर आरोप लगाए जा रहे हैं कि उसके कार्यकाल के दौरान लिए गए कुछ नीतिगत फैसलों से एक विशेष जनसांख्यिकीय पैटर्न को बढ़ावा मिला। आलोचकों का दावा है कि झुग्गी पुनर्विकास, कल्याणकारी योजनाओं के वितरण और प्रशासनिक नियुक्तियों के माध्यम से कुछ वार्डों में दीर्घकालिक राजनीतिक प्रभाव स्थापित करने की कोशिश की गई।
जनसांख्यिकी और वोट-बैंक की राजनीति
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि मुंबई में जनसांख्यिकीय बदलाव अब केवल सामाजिक मुद्दा नहीं, बल्कि सीधा चुनावी विषय बन गया है। आरोप है कि एक ओर हिंदू मतदाताओं को जाति, भाषा और क्षेत्रीय पहचान के आधार पर विभाजित किया जा रहा है, वहीं दूसरी ओर लक्षित योजनाओं और प्रतीकात्मक फैसलों के माध्यम से मुस्लिम वोटों को एकजुट करने की रणनीति अपनाई जा रही है।
अवैध बस्तियां और शहरी नियोजन
बहरामपाड़ा, मालवानी और कुर्ला जैसे क्षेत्रों में अनधिकृत बस्तियों और अवैध निर्माण को लेकर भी बहस तेज है। विपक्ष का आरोप है कि MVA शासनकाल में झुग्गी पुनर्वास और नियमितीकरण के नाम पर अवैध बस्तियों को वैध बनाने के प्रयास किए गए। शहरी विशेषज्ञों का कहना है कि इससे बुनियादी ढांचे, सुरक्षा और संसाधनों पर गंभीर दबाव पड़ सकता है।
मराठी पहचान और प्रवासन का मुद्दा
मुंबई की राजनीति में मराठी पहचान और बाहरी प्रवासन हमेशा से अहम मुद्दा रहा है। उद्धव बालासाहेब ठाकरे (UBT) गुट पर आरोप लगाए जा रहे हैं कि चुनावी लाभ के लिए स्थानीय मराठी आबादी की चिंताओं को नजरअंदाज किया जा रहा है। बढ़ती महंगाई और आवास संकट के चलते कई मराठी परिवार मुंबई से बाहर उपनगरों की ओर पलायन कर रहे हैं, जिससे शहर की सामाजिक संरचना में बदलाव देखा जा रहा है।
प्रतीकवाद और मेयर पद की राजनीति
मुंबई में मुस्लिम मेयर बनाए जाने की संभावनाओं को लेकर भी राजनीतिक टकराव सामने आया है। समर्थक इसे समावेशी राजनीति का प्रतीक बता रहे हैं, जबकि विरोधी इसे चुनाव से पहले तुष्टीकरण की रणनीति करार दे रहे हैं। MVA कार्यकाल के दौरान हुए कुछ प्रतीकात्मक फैसले भी इस बहस को और हवा दे रहे हैं।
एक चौराहे पर खड़ी मुंबई
राजनीतिक टिप्पणीकारों का मानना है कि मुंबई इस समय एक निर्णायक मोड़ पर खड़ी है। जनसांख्यिकीय बदलाव, अवैध प्रवासन, शहरी नियोजन और पहचान की राजनीति आने वाले वर्षों में शहर की दिशा तय कर सकती है। जैसे-जैसे बीएमसी चुनाव नजदीक आ रहे हैं, नागरिक ऐसे नेतृत्व की मांग कर रहे हैं जो मुंबई की सांस्कृतिक पहचान, सुरक्षा और संतुलित विकास को प्राथमिकता दे।
निष्कर्ष:
मुंबई केवल एक महानगर नहीं, बल्कि वैश्विक पहचान रखने वाला शहर है। यदि राजनीतिक लाभ के लिए इसके जनसांख्यिकीय ढांचे से छेड़छाड़ की जाती है, तो उसका प्रभाव केवल चुनावों तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि शहर की सामाजिक स्थिरता, अर्थव्यवस्था और सुरक्षा पर भी पड़ेगा।
