महाराष्ट्र की राजनीति में अगर किसी नेता को ‘पावर हाउस’ कहा गया, तो वह नाम अजीत पवार का है। कम बोलना, तेज फैसले लेना और प्रशासन पर मजबूत पकड़ — यही उनकी पहचान रही है। बारामती की मिट्टी से उठकर सत्ता के शीर्ष तक पहुंचने का उनका सफर केवल राजनीतिक विरासत नहीं, बल्कि रणनीति, संघर्ष और निर्णायक नेतृत्व की कहानी है।
विरासत से आगे की राह
22 जुलाई 1959 को जन्मे अजीत पवार की राजनीति में एंट्री विरासत से हुई, लेकिन टिके रहना उनके अपने फैसलों का नतीजा रहा। पिता अनंतराव पवार के निधन के बाद चाचा शरद पवार उनके मार्गदर्शक बने। सहकारिता आंदोलन से जुड़कर उन्होंने पश्चिमी महाराष्ट्र में मजबूत आधार तैयार किया। चीनी मिलें, दूध संघ और सहकारी बैंक — यही नेटवर्क आगे चलकर उनकी राजनीतिक ताकत बना।
1991 में बारामती लोकसभा सीट से जीत और फिर राज्य की राजनीति में वापसी ने उन्हें महाराष्ट्र का स्थायी खिलाड़ी बना दिया। तीन दशक से अधिक समय तक बारामती विधानसभा सीट पर उनका दबदबा कायम रहा।
सत्ता और प्रशासन पर पकड़
अजीत पवार को फाइलों और आंकड़ों का मास्टर कहा जाता है। वित्त, सिंचाई और जल संसाधन जैसे विभागों में उनके फैसलों ने उन्हें नौकरशाही का सबसे प्रभावशाली चेहरा बना दिया। सुबह जल्दी काम शुरू करना और देर रात तक बैठकों का दौर — यह उनकी कार्यशैली का हिस्सा रहा।
उपमुख्यमंत्री के रूप में कई बार जिम्मेदारी संभालते हुए उन्होंने यह साबित किया कि सत्ता के समीकरण उनके बिना अधूरे रहते हैं। नवंबर 2024 में आठवीं बार बारामती से भारी मतों से मिली जीत उनकी जनस्वीकृति का प्रमाण बनी।
राजनीति का व्यवहारिक चेहरा
अजीत पवार की राजनीति भावनाओं से ज्यादा व्यवहारिकता पर टिकी रही।
उनके लिए न कोई स्थायी मित्र रहा, न स्थायी विरोधी — सिर्फ सत्ता और परिणाम।
- 2019 का राजनीतिक मोड़: देवेंद्र फडणवीस के साथ शपथ ग्रहण ने देश की राजनीति को चौंकाया।
- 2023 का फैसला: राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी में टूट और सत्ता में नई भूमिका ने उनके ‘दादा’ अंदाज को फिर सामने रखा।
- छठी बार उपमुख्यमंत्री: दिसंबर 2024 में यह साफ हो गया कि महाराष्ट्र की राजनीति में अजीत पवार अब भी केंद्रीय धुरी हैं।
“काम बोलता है”
भाषणों से ज्यादा काम पर भरोसा रखने वाले अजीत पवार के लिए बारामती एक मॉडल क्षेत्र रहा है। आधुनिक सड़कें, सिंचाई परियोजनाएं और शहरी ढांचा उनके विजन की पहचान बने।
एक शैली, जो आज भी प्रभावी है
गठबंधन युग की राजनीति में भी अपनी शर्तों पर काम करने वाले अजीत पवार आज भी सत्ता संतुलन की सबसे मजबूत कड़ी माने जाते हैं। महाराष्ट्र की राजनीति में उनका सफर यह बताता है कि सिर्फ विरासत नहीं, बल्कि निर्णय लेने की क्षमता ही किसी नेता को लंबे समय तक प्रासंगिक बनाए रखती है।
