त्रिकूट पर्वत की गोद में विराजमान माता वैष्णो देवी का धाम देश ही नहीं, बल्कि विदेशों में भी आस्था का प्रमुख केंद्र है। हर वर्ष करोड़ों श्रद्धालु कठिन पैदल यात्रा कर माता के दर्शन के लिए यहाँ पहुँचते हैं। मान्यता है कि माता वैष्णो देवी सच्चे मन से की गई हर प्रार्थना को स्वीकार कर भक्तों की मनोकामना पूर्ण करती हैं।
आदिशक्ति का अवतार मानी जाती हैं माता
धार्मिक ग्रंथों और लोकमान्यताओं के अनुसार, माता वैष्णो देवी महाकाली, महालक्ष्मी और महासरस्वती—इन तीन शक्तियों का संयुक्त स्वरूप हैं। इसी कारण उन्हें त्रिकुटा देवी भी कहा जाता है। जब पृथ्वी पर अधर्म और राक्षसी शक्तियों का प्रभाव बढ़ा, तब देवताओं की प्रार्थना पर आदिशक्ति ने वैष्णवी रूप में अवतार लेकर धर्म की रक्षा का संकल्प लिया।
भैरवनाथ से जुड़ी है पवित्र कथा
माता वैष्णो देवी की कथा में भैरवनाथ का विशेष महत्व है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, माता की तपस्या के दौरान भैरवनाथ ने उनका पीछा किया। माता बाण गंगा, चरण पादुका और अर्धक्वारी गुफा से होते हुए पवित्र गुफा तक पहुँचीं। अंततः माता ने चंडी रूप धारण कर भैरवनाथ का वध किया। पश्चाताप करने पर माता ने उसे मुक्ति का वरदान दिया और कहा कि उनके दर्शन के बाद भैरवनाथ के दर्शन करने से ही यात्रा पूर्ण मानी जाएगी।
तीन पिंडियों में होते हैं दर्शन
मुख्य गुफा में माता की कोई मूर्ति नहीं है, बल्कि तीन प्राकृतिक पिंडियाँ विराजमान हैं—
- महाकाली – शक्ति का प्रतीक
- महालक्ष्मी – समृद्धि का प्रतीक
- महासरस्वती – ज्ञान का प्रतीक
यही इस धाम को अन्य शक्तिपीठों से अलग बनाता है।
नवरात्रि में बढ़ती है श्रद्धालुओं की संख्या
विशेषकर चैत्र और शारदीय नवरात्रि के दौरान माता वैष्णो देवी धाम में श्रद्धालुओं की संख्या कई गुना बढ़ जाती है। प्रशासन द्वारा सुरक्षा, चिकित्सा और यात्रा सुविधाओं के विशेष इंतजाम किए जाते हैं।
आस्था और विश्वास का केंद्र
धार्मिक मान्यता है कि माता अपने भक्तों को कभी निराश नहीं करतीं। “जय माता दी” के जयकारों के साथ की जाने वाली यह यात्रा श्रद्धा, तपस्या और विश्वास का प्रतीक मानी जाती है।
