Gudi Padwa : नई दिल्ली। हिंदू धर्म में गुड़ी पड़वा को अत्यंत शुभ और पवित्र पर्व माना जाता है। यह त्योहार हिंदू नववर्ष की शुरुआत का प्रतीक है, जिसे खासतौर पर महाराष्ट्र में बड़े उत्साह और परंपराओं के साथ मनाया जाता है। इस वर्ष यह पर्व 19 मार्च 2026 को मनाया जा रहा है, जो चैत्र नवरात्रि के पहले दिन के साथ विशेष महत्व रखता है।
नववर्ष और समृद्धि का प्रतीक है गुड़ी पड़वा
गुड़ी पड़वा केवल एक त्योहार नहीं, बल्कि नई शुरुआत, खुशहाली और समृद्धि का प्रतीक है। इस दिन लोग अपने घरों के बाहर ‘गुड़ी’ यानी विजय ध्वज लगाते हैं, रंगोली बनाते हैं और पारंपरिक व्यंजन जैसे पूरन पोली, श्रीखंड और खीर तैयार करते हैं। यह पर्व वसंत ऋतु के आगमन और नई फसलों की खुशियों का भी संदेश देता है।
ब्रह्मा जी से जुड़ा है सृष्टि निर्माण का संबंध
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, चैत्र मास की शुक्ल प्रतिपदा तिथि के दिन सृष्टिकर्ता ब्रह्मा जी ने इस ब्रह्मांड की रचना प्रारंभ की थी। इसी कारण इस दिन को नवसंवत्सर या नए वर्ष का आरंभ माना जाता है। यह दिन सृजन, ऊर्जा और नई संभावनाओं का प्रतीक है।
भगवान राम से भी जुड़ा है विशेष संबंध
लोक मान्यताओं के अनुसार, इसी दिन भगवान श्रीराम ने बाली के अत्याचारों का अंत कर धर्म की स्थापना की थी। इस विजय के उपलक्ष्य में लोगों ने घर-घर में ध्वज फहराकर उत्सव मनाया, जो आगे चलकर ‘गुड़ी’ की परंपरा में बदल गया। इसलिए इसे विजय और धर्म की स्थापना का प्रतीक भी माना जाता है।
महाभारत काल और ऐतिहासिक महत्व
गुड़ी पड़वा का संबंध महाभारत काल से भी जोड़ा जाता है। मान्यता है कि इसी दिन धर्मराज युधिष्ठिर का राजतिलक हुआ था। इसके अलावा राजा विक्रमादित्य ने शकों पर विजय प्राप्त कर विक्रम संवत की स्थापना भी इसी दिन की थी, जिससे इस पर्व का ऐतिहासिक महत्व और बढ़ जाता है।
गुड़ी पड़वा मनाने की परंपरा और अर्थ
‘गुड़ी’ का अर्थ है विजय पताका और ‘पड़वा’ का अर्थ है प्रतिपदा तिथि। इस दिन घरों के मुख्य द्वार या छत पर गुड़ी स्थापित की जाती है, जो बुराई पर अच्छाई की जीत और समृद्धि के आगमन का संकेत देती है। साथ ही दरवाजों पर आम के पत्तों की तोरण भी सजाई जाती है।
गुड़ी पड़वा न केवल धार्मिक आस्था का प्रतीक है, बल्कि यह जीवन में नई शुरुआत, सकारात्मकता और संतुलन का संदेश भी देता है। यह पर्व हमें याद दिलाता है कि हर अंत के बाद एक नई शुरुआत जरूर होती है।
