अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ते तनाव के बीच अमेरिकी नौसेना का सबसे उन्नत और महंगा विमानवाहक पोत USS Gerald R. Ford चर्चा में है। करीब 13 बिलियन डॉलर (एक लाख करोड़ रुपये से अधिक) की लागत से निर्मित इस न्यूक्लियर पावर से चलने वाले एयरक्राफ्ट कैरियर को हाल ही में संवेदनशील समुद्री क्षेत्र में तैनात किया गया है।
हालांकि सैन्य ताकत के प्रदर्शन के बीच जहाज के अंदर एक अलग तरह का संकट खड़ा हो गया है। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, जहाज पर मौजूद 650 टॉयलेट में से अधिकांश काम करना बंद कर चुके हैं, जिससे लगभग 4,500 नाविकों को भारी असुविधा का सामना करना पड़ रहा है।
वैक्यूम सिस्टम में खराबी बनी वजह
रिपोर्ट्स के अनुसार, फोर्ड का सीवेज सिस्टम वैक्यूम-आधारित मॉड्यूल पर काम करता है। यदि एक भी वाल्व फेल हो जाए तो पूरे सिस्टम में सक्शन बंद हो सकता है, जिससे सभी टॉयलेट प्रभावित हो जाते हैं। लंबे समय तक समुद्र में तैनाती और सीमित मेंटेनेंस के कारण सिस्टम में तकनीकी खराबी आई है।
विशेषज्ञों का मानना है कि समस्या के स्थायी समाधान के लिए जहाज को ड्राई डॉक में ले जाकर व्यापक मरम्मत करनी होगी। लेकिन मौजूदा रणनीतिक तैनाती और क्षेत्रीय हालात को देखते हुए निकट भविष्य में ऐसा संभव नहीं दिख रहा।
नाविकों में बढ़ती नाराज़गी
सूत्रों के मुताबिक, जहाज पर तैनात कई नाविक इस स्थिति से निराश हैं और कुछ के बारे में कहा जा रहा है कि वे नेवी छोड़ने पर विचार कर रहे हैं। तकनीकी स्टाफ और संचालन टीम के बीच जिम्मेदारी को लेकर मतभेद भी सामने आए हैं।
NPR की एक रिपोर्ट में गवर्नमेंट अकाउंटेबिलिटी ऑफिस की अधिकारी शेल्बी ओकले के हवाले से कहा गया कि “जब हम नाविकों से कठिन परिस्थितियों में तैनाती की अपेक्षा करते हैं, तो कम से कम उन्हें बुनियादी रहने की सुविधाएं उपलब्ध कराना हमारी जिम्मेदारी है।”
रणनीतिक तैनाती पर नजर
मध्य-पूर्व में बढ़ते तनाव के बीच यह देखना अहम होगा कि अमेरिकी प्रशासन आगे क्या फैसला लेता है। मौजूदा स्थिति में USS Gerald R. Ford की तैनाती जारी रहती है या उसे मरम्मत के लिए वापस बुलाया जाता है, इस पर निगाहें टिकी हैं।
