गूगल की एआई लैब DeepMind के प्रमुख डेमिस हसाबिस ने आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस की वैश्विक दौड़ पर महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए कहा है कि चीन अब एआई क्षमताओं में अमेरिका से “सिर्फ कुछ महीनों” की दूरी पर रह गया है। एक हालिया पॉडकास्ट इंटरव्यू में उन्होंने संकेत दिया कि चीन ने सीमित संसाधनों और अपेक्षाकृत पुराने चिप्स के बावजूद ऐसे मॉडल विकसित किए हैं, जिनकी परफॉर्मेंस अमेरिकी मॉडलों के समकक्ष आंकी जा रही है।
हसाबिस ने खास तौर पर चीनी लैब DeepSeek के मॉडल का उल्लेख किया, जिसने कम बजट में उच्च प्रदर्शन दिखाकर उद्योग जगत का ध्यान खींचा। इसके साथ ही अलीबाबा, मूनशॉट और झिपु जैसी कंपनियों के तेज़ी से उभरते एआई समाधान भी चीन की बढ़ती क्षमता का संकेत देते हैं।
हालांकि, हसाबिस ने यह भी जोड़ा कि बराबरी की गति दिखाना एक बात है, लेकिन मौलिक वैज्ञानिक नवाचार करना अलग चुनौती है। उनके अनुसार, 2017 में गूगल द्वारा विकसित “ट्रांसफॉर्मर” आर्किटेक्चर जैसा क्रांतिकारी विचार एआई की दिशा बदल देता है—आज के अधिकांश बड़े मॉडल उसी पर आधारित हैं। सवाल यह है कि क्या चीन ऐसा कोई नया ब्रेकथ्रू पेश कर पाएगा।
कुछ विश्लेषकों का मानना है कि उन्नत चिप्स की उपलब्धता और विशाल कंप्यूटिंग इंफ्रास्ट्रक्चर के कारण अमेरिका को दीर्घकाल में बढ़त मिल सकती है। निवेश प्रबंधन कंपनी Janus Henderson से जुड़े विशेषज्ञों के मुताबिक, आने वाले वर्षों में अमेरिकी एआई ढांचा और मजबूत होगा, जिससे अंतर फिर बढ़ सकता है। चीनी विशेषज्ञ भी मानते हैं कि 3–5 वर्षों में अमेरिका से आगे निकलने की संभावना सीमित है।
हसाबिस के अनुसार, असली फर्क तकनीक से ज्यादा अनुसंधान की मानसिकता में है। उन्होंने DeepMind को “आधुनिक बेल लैब्स” जैसा बताते हुए कहा कि केवल मौजूदा तकनीक को बेहतर बनाना पर्याप्त नहीं, बल्कि नए वैज्ञानिक प्रयोगों को बढ़ावा देना जरूरी है। नकल करना आसान है, लेकिन पूरी तरह नया विचार गढ़ना कठिन—और यही अगली बड़ी कसौटी होगी।
एआई पर बढ़ती वैश्विक प्रतिस्पर्धा के बीच यह बयान संकेत देता है कि आने वाले समय में अमेरिका–चीन तकनीकी होड़ और तेज हो सकती है, जिसका प्रभाव वैश्विक टेक उद्योग, नीतियों और निवेश पर भी दिखेगा।
