भगवान विष्णु का विट्ठल अवतार : श्रीहरी विठ्ठल की कथा
हिंदू धर्म में भगवान विष्णु को जगत के पालनहार और सृष्टि के रक्षक के रूप में पूजा जाता है। भगवान विष्णु ने संसार के कल्याण के लिए विभिन्न अवतार लिए, जिनमें से एक विशेष और प्रसिद्ध अवतार है विट्ठल। भगवान विष्णु को विट्ठल या विठोबा के नाम से विशेष रूप से महाराष्ट्र और कर्नाटका में पूजा जाता है। आइए जानते हैं भगवान विष्णु को यह नाम कैसे मिला और क्या है इसके पीछे की दिलचस्प कहानी।
श्रीहरी विट्ठल की कथा
यह कथा देवी रुक्मिणी, भगवान विष्णु और उनके भक्त पुंडलिक से जुड़ी हुई है। कथा के अनुसार, एक बार देवी रुक्मिणी भगवान विष्णु से किसी कारणवश नाराज हो गईं और द्वारका छोड़कर चली गईं। भगवान विष्णु, देवी रुक्मिणी को मनाने के लिए उनके पीछे-पीछे गए और आखिरकार दिंडी वन में उन्हें खोज लिया। भगवान विष्णु ने देवी रुक्मिणी को समझाया और उनका क्रोध शांत किया।
अब इस समय वहां एक आश्रम था, जिसमें एक भक्त पुंडलिक रहते थे। पुंडलिक अपने माता-पिता की सेवा में व्यस्त रहते थे और उनकी सेवा को प्राथमिकता देते थे। भगवान विष्णु और देवी रुक्मिणी इस आश्रम में पहुंचे, लेकिन पुंडलिक उस समय अपनी माता-पिता की सेवा में लगे हुए थे। भगवान विष्णु ने उनसे मिलने की इच्छा जताई, लेकिन पुंडलिक ने उन्हें थोड़ा इंतजार करने के लिए कहा।
ईंट पर खड़े होकर भगवान का इंतजार
पुंडलिक ने भगवान विष्णु से कहा कि वह उस समय अपनी सेवा में व्यस्त है, लेकिन भगवान को थोड़ा इंतजार करने के लिए कहा। इस पर पुंडलिक ने एक ईंट को उठाया और भगवान विष्णु से कहा कि वह उस पर खड़े होकर इंतजार करें। भगवान विष्णु ने अपने भक्त की बात मानी और बिना किसी विरोध के उस ईंट पर खड़े हो गए। देवी रुक्मिणी भी भगवान विष्णु के साथ उस ईंट पर खड़ी हो गईं।
जब पुंडलिक अपने माता-पिता की सेवा से फुर्सत पाकर उनके पास आया, तो भगवान विष्णु ने उसे वरदान मांगने को कहा। पुंडलिक ने भगवान से निवेदन किया कि वह यहीं रुक जाएं और हमेशा इसी स्थान पर निवास करें। भगवान विष्णु ने अपने भक्त की श्रद्धा को देखा और उसी ईंट पर खड़े होकर, कमर पर हाथ रखकर, प्रसन्न मुद्रा में स्थिर हो गए।

विट्ठल नाम का जन्म
इस घटना के बाद भगवान विष्णु का यह रूप विट्ठल के नाम से प्रसिद्ध हुआ। दरअसल, ईंट को मराठी में विट कहा जाता है और भगवान विष्णु का इस ईंट पर खड़ा होना, उनके इस रूप को “विट्ठल” नाम दिया गया। “विट” (ईंट) और “ठल” (खड़ा होना) का संयोजन होते हुए भगवान का नाम विट्ठल पड़ा। यह रूप विशेष रूप से भक्तों के बीच अत्यधिक प्रिय हुआ और पंढरपूर के मंदिर में भगवान विट्ठल की पूजा आज भी श्रद्धा भाव से की जाती है।
निष्कर्ष
भगवान विष्णु का विट्ठल अवतार उनके भक्त पुंडलिक की अत्यधिक भक्ति और श्रद्धा का प्रतीक बन गया। इस कथा के माध्यम से यह संदेश मिलता है कि भगवान अपने भक्तों की भक्ति और श्रद्धा को कभी नकारते नहीं हैं और उन्हें उनके अनुरूप आशीर्वाद देते हैं। विट्ठल नाम से भगवान विष्णु का यह रूप आज भी महाराष्ट्र और कर्नाटका में विशेष पूजा जाता है, और उनके भक्त बड़े श्रद्धा भाव से उनकी पूजा करते हैं।