भगवान शिव के प्रिय वाहन नंदी केवल एक बैल ही नहीं, बल्कि उनके अनन्य भक्त और शिवगणों के प्रमुख हैं। नंदी को धर्म, भक्ति और निष्ठा का प्रतीक माना जाता है। पौराणिक कथाओं में नंदी के जन्म को लेकर कई रोचक कथाएं मिलती हैं।
नंदी के जन्म की कथा
शिव पुराण और अन्य धर्मग्रंथों के अनुसार, नंदी ऋषि शिलाद के पुत्र थे। ऋषि शिलाद ने घोर तपस्या कर भगवान शिव को प्रसन्न किया और एक ऐसे पुत्र की कामना की, जो जन्म और मृत्यु के बंधन से मुक्त हो। शिवजी ने उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर उन्हें वरदान दिया कि उनका पुत्र दिव्य और अमर होगा।
कैसे हुआ नंदी का जन्म?
- ऋषि शिलाद ने शिवजी से प्राप्त प्रसाद से एक यज्ञ किया, जिसके फलस्वरूप उन्हें एक तेजस्वी बालक प्राप्त हुआ।
- इस बालक का नाम नंदी रखा गया।
- नंदी बचपन से ही भगवान शिव के अनन्य भक्त बन गए और कठोर तपस्या करने लगे।
- जब उन्होंने घोर तपस्या की, तो भगवान शिव स्वयं प्रकट हुए और उन्हें अपना वाहन एवं गणों का मुखिया बना लिया।
नंदी और शिवजी का अटूट संबंध
नंदी न केवल भगवान शिव के वाहन हैं, बल्कि उनके द्वारपाल और परम भक्त भी हैं। शिव मंदिरों में नंदी की मूर्ति हमेशा शिवलिंग के सामने स्थापित होती है, क्योंकि कहा जाता है कि नंदी के कान में भक्त जो भी इच्छा बोलते हैं, वह सीधा भगवान शिव तक पहुंचती है।
नंदी से जुड़ी एक रोचक मान्यता
शिव भक्तों का मानना है कि अगर कोई व्यक्ति शिव मंदिर में नंदी के कान में अपनी मनोकामना कहता है, तो भगवान शिव उसे अवश्य पूरा करते हैं। इसलिए महाशिवरात्रि और विशेष शिव पूजा में नंदी की पूजा का भी विशेष महत्व होता है।
निष्कर्ष
नंदी केवल भगवान शिव के वाहन नहीं, बल्कि भक्ति, सेवा और समर्पण के प्रतीक भी हैं। उनकी कथा हमें सिखाती है कि सच्ची भक्ति से हम भगवान की कृपा प्राप्त कर सकते हैं और जन्म-मृत्यु के बंधन से मुक्त हो सकते हैं।