महेंद्र उपाध्याय । आज कूर्म द्वादशी का पावन पर्व मनाया जा रहा है। हिंदू धर्म में कूर्म द्वादशी का विशेष धार्मिक महत्व है। मान्यता है कि इसी दिन भगवान विष्णु ने अपने दूसरे अवतार के रूप में कूर्म यानी कछुए का रूप धारण किया था। यह तिथि भगवान विष्णु के कुर्म अवतार को समर्पित होती है और इस दिन व्रत एवं पूजा करने से व्यक्ति के जीवन से सभी संकट दूर होते हैं तथा मनोकामनाओं की पूर्ति होती है।
क्या है कूर्म द्वादशी
कूर्म द्वादशी पौष मास के शुक्ल पक्ष की द्वादशी तिथि को मनाई जाती है। ‘कूर्म’ संस्कृत शब्द है, जिसका अर्थ कछुआ होता है। धार्मिक ग्रंथों के अनुसार समुद्र मंथन के दौरान जब मंदराचल पर्वत समुद्र में धंसने लगा, तब भगवान विष्णु ने कछुए का रूप धारण कर पर्वत को अपनी पीठ पर धारण किया था। इसी कारण इस अवतार को कूर्म अवतार कहा गया।
कूर्म द्वादशी का धार्मिक महत्व
शास्त्रों में कूर्म द्वादशी व्रत को अत्यंत फलदायी बताया गया है। इस दिन भगवान विष्णु की पूजा करने से पापों का नाश होता है और साधक को सुख, शांति एवं समृद्धि की प्राप्ति होती है। मान्यता है कि इस व्रत के प्रभाव से जीवन की बाधाएं दूर होती हैं और भक्त संकटों से मुक्त रहता है।
पंडितों के अनुसार, कूर्म द्वादशी के दिन घर या दुकान में चांदी या अष्टधातु का कछुआ रखना शुभ माना जाता है। विशेष रूप से काले रंग का कछुआ आर्थिक उन्नति और स्थिरता का प्रतीक माना गया है।
कूर्म द्वादशी पूजा विधि
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार कूर्म द्वादशी के दिन सुबह सूर्योदय से पहले उठकर स्नान करें और व्रत का संकल्प लें। इसके बाद साफ वस्त्र धारण कर घर के मंदिर की साफ-सफाई करें।
स्वच्छ चौकी पर कपड़ा बिछाकर भगवान विष्णु के कूर्म अवतार की प्रतिमा स्थापित करें। इसके बाद सिंदूर, लाल फूल, धूप, दीप और तुलसी पत्र अर्पित करें। इस दिन कूर्म स्तोत्र, विष्णु सहस्रनाम और नारायण स्तोत्र का पाठ करना विशेष शुभ माना जाता है। अंत में भगवान विष्णु की आरती कर फल और मिठाई का भोग लगाएं और प्रसाद का वितरण करें।
क्यों मनाई जाती है कूर्म द्वादशी
पौराणिक कथाओं के अनुसार, असुरराज बलि द्वारा देवताओं को पराजित कर स्वर्ग पर अधिकार कर लेने के बाद देवता अपनी शक्तियां खो बैठे थे। तब भगवान विष्णु के सुझाव पर देवताओं और दैत्यों ने मिलकर समुद्र मंथन किया। समुद्र मंथन के दौरान जब मंदराचल पर्वत डूबने लगा, तब भगवान विष्णु ने कूर्म अवतार लेकर पर्वत को अपनी पीठ पर संभाला। इसी घटना की स्मृति में कूर्म द्वादशी मनाई जाती है।
धार्मिक विश्वास है कि इस दिन व्रत और विधिवत पूजा करने से भक्तों को मोक्ष की प्राप्ति होती है और जीवन में सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।
