नई दिल्ली। गणेश चतुर्थी और अन्य शुभ अवसरों पर जब भी घर या मंदिर में गणेश जी की स्थापना की जाती है, तो उनकी सूंड की दिशा अक्सर लोगों का ध्यान आकर्षित करती है। शास्त्रों और परंपराओं में सूंड की दिशा को लेकर विशेष महत्व बताया गया है। भगवान गणेश, जिन्हें विघ्नहर्ता और बुद्धि के देवता के रूप में पूजा जाता है, हर शुभ कार्य की शुरुआत में पूजे जाते हैं।
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कुछ प्रतिमाओं में उनकी सूंड बाईं ओर मुड़ी होती है और कुछ में दाईं ओर। यह सिर्फ़ एक डिज़ाइन का हिस्सा नहीं है, बल्कि इसके पीछे गहरा धार्मिक और आध्यात्मिक महत्व छिपा है।

बाईं ओर सूंड वाले गणपति – घर के लिए श्रेष्ठ
- सुख-शांति और सौम्यता का प्रतीक:
बाईं ओर मुड़ी सूंड वाले गणपति को शांत और सौम्य स्वरूप वाला माना जाता है। घर में इस प्रतिमा की पूजा करने से परिवार में शांति, प्रेम और सामंजस्य बना रहता है। - हृदय और भावनाओं से जुड़ा:
शरीर का बायां हिस्सा हृदय और भावनाओं का प्रतीक माना जाता है। इसलिए घर में बाईं सूंड वाले गणेश जी रखने से पारिवारिक सुख-समृद्धि बढ़ती है। - वैदिक परंपरा का प्रभाव:
वैदिक परंपरा में इसे घर-परिवार में स्थिरता और समृद्धि का कारक माना गया है।
दाईं ओर सूंड वाले गणपति – मंदिरों और तांत्रिक पूजा के लिए
- शक्ति और सक्रियता का प्रतीक:
दाईं ओर सूंड वाले गणपति अत्यधिक शक्तिशाली और जाग्रत माने जाते हैं। यह स्वरूप आध्यात्मिक ऊर्जा, ऐश्वर्य और विजय का प्रतीक है। - मंदिरों और विशेष साधनाओं में पूजनीय:
तांत्रिक परंपराओं में इस स्वरूप का विशेष महत्व है। शास्त्रों के अनुसार, इसकी पूजा विधि-विधान से करनी चाहिए। - आध्यात्मिक संदेश:
दाईं ओर सूंड वाले गणपति जीवन में कर्मशीलता और जागरूकता का संदेश देते हैं।
सूंड की दिशा का आध्यात्मिक महत्व
- बाईं सूंड: शांति, प्रेम, सौम्यता और पारिवारिक सुख का प्रतीक।
- दाईं सूंड: शक्ति, आध्यात्मिकता, ऐश्वर्य और विजय का प्रतीक।
गणेश जी की सूंड हमेशा हिलती-डुलती रहती है, जो उनके सदैव सक्रिय रहने और जाग्रत रहने का संकेत देती है। यही हमें जीवन में कर्मशील बने रहने और हर कार्य में सजग रहने की प्रेरणा देती है।
