जगदलपुर, वर्तमान समय में जलवायु परिवर्तन, पशुचारे की कमी और फसल कटाई के बाद पराली (पैरा) जलाने से हो रहे पर्यावरणीय नुकसान ने किसानों और पशुपालकों के समक्ष गंभीर चुनौती खड़ी कर दी है। इन समस्याओं के समाधान तथा किसानों की आय बढ़ाने के उद्देश्य से शहीद गुंडाधुर कृषि महाविद्यालय एवं अनुसंधान केंद्र, जगदलपुर द्वारा एक महत्वपूर्ण पहल की गई है।
महाविद्यालय ने किसानों से अपील की है कि वे खेतों में पैरा जलाने के बजाय उसका वैज्ञानिक विधि से यूरिया उपचार कर पशुओं के लिए पौष्टिक चारे के रूप में उपयोग करें। इससे न केवल पर्यावरण संरक्षण होगा, बल्कि पशुपालन को भी आर्थिक रूप से सुदृढ़ बनाया जा सकेगा।
कृषि वैज्ञानिकों ने सर्वेक्षण के आंकड़ों का हवाला देते हुए बताया कि देश में हरे और सूखे चारे की भारी कमी है, जिसका प्रतिकूल प्रभाव पशुओं के स्वास्थ्य एवं दुग्ध उत्पादन पर पड़ता है। इसी समस्या को दूर करने के लिए महाविद्यालय के अधिष्ठाता डॉ. आर.एस. नेताम के मार्गदर्शन में ग्रामीण कृषि कार्य अनुभव (रावे) कार्यक्रम के अंतर्गत कृषि छात्रों को व्यावहारिक प्रशिक्षण प्रदान किया गया।
लर्निंग बाय डूइंग सिद्धांत के तहत सहायक प्राध्यापक डॉ. नीता मिश्रा ने विद्यार्थियों को पैरा के यूरिया उपचार की विधि का जीवंत प्रदर्शन कर प्रशिक्षण दिया। इस प्रक्रिया में एक क्विंटल कुट्टी किए गए पैरे पर चार प्रतिशत यूरिया के घोल का परत-दर-परत छिड़काव किया जाता है। इसके बाद इसे अच्छी तरह मिलाकर वायुरहित अवस्था में तीन सप्ताह तक दबाकर रखा जाता है। तीन सप्ताह पश्चात इसे हवा में सुखाकर पशुओं को खिलाया जाता है।
वैज्ञानिकों के अनुसार, साधारण पैरे में सिलिका और ऑक्सालेट जैसे तत्व अधिक होने के कारण यह पशुओं के लिए कम उपयोगी होता है, जबकि यूरिया उपचार के बाद इसमें प्रोटीन की मात्रा बढ़कर छह से आठ प्रतिशत तक हो जाती है। यह विधि चारे को सुपाच्य बनाती है, जिससे पशुओं के स्वास्थ्य में सुधार होता है और दुग्ध उत्पादन में वृद्धि होती है।
महाविद्यालय प्रबंधन ने क्षेत्र के किसानों से इस चारा संरक्षण तकनीक को अपनाने की अपील की है तथा किसी भी तकनीकी सहायता के लिए कृषि महाविद्यालय या नजदीकी पशु चिकित्सक से संपर्क करने का आग्रह किया है।
