डॉ. मोहन भागवत ने हाल ही में नागपुर में आयोजित एक कार्यक्रम में जनसंख्या वृद्धि और परिवार नियोजन पर चर्चा करते हुए कहा कि हर परिवार में कम से कम तीन बच्चे होने चाहिए। उन्होंने इस विचार को प्रस्तुत करते हुए जनसांख्यिकी (डेमोग्राफी) का हवाला दिया और कहा कि देश में संतुलित जनसंख्या बनाए रखना आवश्यक है। उनका कहना था कि जनसंख्या नियंत्रण नीतियों में एक निश्चित संतुलन होना चाहिए ताकि किसी भी समुदाय या क्षेत्र में असंतुलन न हो।
इस बयान के संदर्भ में, भागवत का यह तर्क है कि जनसंख्या वृद्धि से जुड़े निर्णय केवल आर्थिक और सामाजिक दृष्टिकोण से नहीं, बल्कि राष्ट्रीय संतुलन और सांस्कृतिक पहचान को ध्यान में रखते हुए लिए जाने चाहिए। उन्होंने यह भी कहा कि परिवारों को अपनी जिम्मेदारियों के प्रति सचेत रहना चाहिए और जनसंख्या शास्त्र का अध्ययन करके सही दिशा में कदम उठाना चाहिए।
संघ प्रमुख के बयान के निकाले जा रहे मायने
संघ प्रमुख का यह बयान ऐसे समय आया है जब देश में जनसंख्या कानून लाने की मांग उठ रही है। साथ ही पिछले दिनों भारत ने आबादी के मामले में चीन को पीछे छोड़ दिया है।
बहरहाल, संघ प्रमुख के इस बयान पर देश में एक बार फिर बहस छिड़ गई है। कुछ लोगों का कहना है कि भारत में पहले ही जनसंख्या विस्फोट हो चुका है। ऐसे में ज्यादा बच्चे ठीक नहीं।
वहीं हिंदुओं का एक धड़ा कहता है कि भारत में मुस्लिम आबादी तेजी से बढ़ रही है, जबकि हिंदू कम संतानें पैदा कर रहे हैं। इस तरह हिंदू खतरे में है और उन्हें ज्यादा बच्चे पैदा करना चाहिए।
देखना यही है कि संघ प्रमुख के बयान पर कांग्रेस के साथ ही असदुद्दीन ओवैसी की क्या प्रतिक्रिया होती है। भाजपा में भी कई नेता ऐसे हैं जो खुलकर हिंदुओं की आबादी बढ़ने की वकालत करते हैं।