दिल्ली उच्च न्यायालय ने पॉक्सो (POCSO) मामले में एक आरोपी को बरी कर दिया, जिसे निचली अदालत ने आजीवन कारावास की सजा सुनाई थी। अदालत ने कहा कि नाबालिग पीड़िता द्वारा ‘शारीरिक संबंध’ शब्द का इस्तेमाल यौन उत्पीड़न साबित करने के लिए पर्याप्त नहीं है।
कोर्ट का फैसला
न्यायमूर्ति प्रतिभा एम. सिंह और न्यायमूर्ति अमित शर्मा की पीठ ने कहा कि “शारीरिक संबंध” शब्द का अर्थ स्पष्ट नहीं है, और इसे यौन उत्पीड़न या यौन संभोग के रूप में प्रमाणित करने के लिए पर्याप्त साक्ष्य होने चाहिए। अदालत ने यह भी कहा कि केवल पीड़िता की उम्र 18 साल से कम होने के आधार पर यौन उत्पीड़न का निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता।
POCSO कानून पर कोर्ट का नजरिया
हाईकोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि POCSO अधिनियम के तहत नाबालिग की सहमति मान्य नहीं है, लेकिन ‘शारीरिक संबंध’ या ‘संबंध बनाया’ जैसे शब्दों का उपयोग यौन उत्पीड़न के अपराध को स्वतः प्रमाणित नहीं करता। यह साबित करने के लिए ठोस और स्पष्ट सबूत आवश्यक हैं।
मामले की पृष्ठभूमि
मार्च 2017 में नाबालिग लड़की की मां ने शिकायत दर्ज कराई थी कि उसकी 14 वर्षीय बेटी को एक अज्ञात व्यक्ति ने बहला-फुसलाकर अगवा किया था। बाद में लड़की फरीदाबाद में आरोपी के साथ मिली। दिसंबर 2023 में निचली अदालत ने आरोपी को दोषी ठहराते हुए आजीवन कारावास की सजा सुनाई थी।
हाईकोर्ट ने क्या कहा?
हाईकोर्ट ने निचली अदालत के फैसले को रद्द करते हुए कहा कि उसमें किसी ठोस तर्क या साक्ष्य का समर्थन नहीं था। कोर्ट ने दोषसिद्धि को अवैध बताते हुए आरोपी को बरी कर दिया।
फैसले का महत्व
यह फैसला न्याय प्रक्रिया में साक्ष्य और तर्क के महत्व को रेखांकित करता है। साथ ही, यह पॉक्सो जैसे गंभीर कानूनों के तहत निष्पक्षता और प्रमाण आधारित न्याय की आवश्यकता को भी रेखांकित करता है।