‘मर्दानी 3’ के साथ भारतीय सिनेमा में पूरे किए तीन दशक
भारतीय सिनेमा की सबसे प्रभावशाली और विश्वसनीय अभिनेत्रियों में शुमार रानी मुखर्जी ने फिल्म इंडस्ट्री में अपने शानदार 30 वर्ष पूरे कर लिए हैं। राजा की आएगी बारात (1997) से शुरू हुआ यह सफर आज उस मुकाम पर है, जहां वे अपनी शर्तों पर फिल्में चुनती हैं और सिनेमा को सिर्फ मनोरंजन नहीं, बल्कि सामाजिक जिम्मेदारी मानती हैं। इस खास पड़ाव पर रानी ने अपने करियर, अपने फैसलों और बहुप्रतीक्षित फिल्म ‘मर्दानी 3’ को लेकर खुलकर बात की है।
“मेरा करियर एम्बिशन से नहीं, इंस्टिंक्ट से बना”
यश राज फिल्म्स के आधिकारिक सोशल मीडिया हैंडल पर साझा किए गए एक भावुक नोट में रानी मुखर्जी ने इस मील के पत्थर को सेलिब्रेट किया। उन्होंने लिखा कि उनका करियर किसी मास्टर प्लान का नतीजा नहीं, बल्कि कहानी कहने के प्यार, भावनात्मक ईमानदारी और सहज प्रवृत्ति पर भरोसे से बना है।
उन्होंने बताया कि उन्होंने कभी अभिनय को मंज़िल नहीं माना, इसलिए समय कैसे बीत गया, इसका एहसास ही नहीं हुआ।
सिनेमा और साहस का सफर
ब्लैक, हिचकी, नो वन किल्ड जेसिका और मिसेज चटर्जी वर्सेस नॉर्वे जैसी फिल्मों के ज़रिए रानी ने हमेशा चुनौतीपूर्ण और अर्थपूर्ण किरदारों को चुना। उनका मानना है कि एक अभिनेत्री का साहस बॉक्स ऑफिस नंबरों से नहीं, बल्कि सार्थक सिनेमा चुनने के फैसले से झलकता है।
शुरुआत से बनी सोच
रानी मुखर्जी ने कहा कि राजा की आएगी बारात ने उन्हें यह सिखाया कि सिनेमा केवल ग्लैमर नहीं, बल्कि जिम्मेदारी भी है। करियर की शुरुआत में ही गरिमा और न्याय के लिए लड़ने वाली महिला का किरदार निभाने का असर उनके पूरे फिल्मी सफर पर दिखाई देता है—ऐसी महिलाएं जो सिस्टम को चुनौती देती हैं और चुप रहने से इनकार करती हैं।
2000 का दशक बना टर्निंग पॉइंट
साथिया (2002) से पहचान, हम तुम (2004) से संवेदनशीलता और हास्य, और ब्लैक (2005) से अभिनय की गहराई—इस दौर ने रानी को एक परिपक्व कलाकार के रूप में स्थापित किया। संजय लीला भंसाली और अमिताभ बच्चन के साथ काम को उन्होंने अपने करियर का सबसे कठिन लेकिन सीख से भरा अनुभव बताया।
शादी, मातृत्व और नया दृष्टिकोण
रानी ने साफ कहा कि शादी और मां बनने से उनका करियर धीमा नहीं हुआ, बल्कि उनका फोकस और स्पष्ट हो गया। काम को लेकर चयनशील होने से उन्हें उस तरह की विरासत गढ़ने का मौका मिला, जो वे छोड़ना चाहती हैं।
हिचकी ने उन्हें संवेदनशीलता और प्रतिनिधित्व की अहमियत समझाई, वहीं मिसेज चटर्जी वर्सेस नॉर्वे (2023) ने यह साबित किया कि भावनात्मक सच्चाई सीमाओं से परे होती है। इसी फिल्म के लिए उन्हें राष्ट्रीय पुरस्कार भी मिला।
प्रासंगिकता नहीं, ईमानदारी है मायने
47 वर्षीय अभिनेत्री का मानना है कि लंबा करियर प्रासंगिक बने रहने से नहीं, बल्कि ईमानदार रहने से बनता है। उनके लिए सबसे कीमती चीजें अवॉर्ड या कलेक्शन नहीं, बल्कि वे पल हैं—मुश्किल सीन के बाद की खामोशी और दर्शकों से बना भावनात्मक रिश्ता।
‘मर्दानी 3’ से खास जुड़ाव
रानी मुखर्जी ने बताया कि ‘मर्दानी 3’ (2026) के साथ 30 साल पूरे करना उनके लिए बेहद खास है। उन्होंने इसे ब्रह्मांड का संकेत बताते हुए कहा कि यह फ्रेंचाइजी उन्हें आज की महिलाओं की भावना और महिला पुलिस अधिकारियों की मजबूती को सलाम करने का मौका देती है।
अभिराज मीनावाला द्वारा निर्देशित और आदित्य चोपड़ा द्वारा निर्मित मर्दानी 3 30 जनवरी को सिनेमाघरों में रिलीज़ होने जा रही है।
आभार के साथ सफर जारी
अपने नोट के अंत में रानी ने सहयोगियों और दर्शकों का आभार जताते हुए लिखा—
“जब तक कहानियाँ हैं और भावनाएँ तलाशनी बाकी हैं, मैं इस कला की छात्रा बनी रहूँगी।”
30 साल बाद भी, रानी मुखर्जी खुद को एक नई कलाकार की तरह महसूस करती हैं—जो और मेहनत, नई चुनौतियों और एक नए अध्याय के लिए पूरी तरह तैयार है।
