परिचय: महंत घासीदास संग्रहालय, रायपुर, छत्तीसगढ़ का प्रमुख ऐतिहासिक और सांस्कृतिक संग्रहालय है, जिसे 1875 में स्थापित किया गया था। इसका नाम छत्तीसगढ़ के प्रसिद्ध महंत घासीदास के नाम पर रखा गया है। यह संग्रहालय राज्य की लोक कला, संस्कृति और पुरातन सभ्यता की धरोहर को संजोए हुए है। यह संग्रहालय राज्य के इतिहास और संस्कृति को समझने के लिए एक अद्वितीय स्थान है, जिसमें न केवल पुरानी मूर्तियां, सिक्के और पांडुलिपियां हैं, बल्कि यहां पारंपरिक वाद्ययंत्र, शस्त्र, और प्राचीन आभूषण भी प्रदर्शित किए गए हैं।
महंत घासीदास संग्रहालय : एक ऐतिहासिक धरोहर
महंत घासीदास संग्रहालय, जिसे 1875 में राजनांदगांव के महाराजा महंत घासीदास ने स्थापित किया था, छत्तीसगढ़ की लोक कला, संस्कृति और पुरातन सभ्यता का जीवित उदाहरण है। यह संग्रहालय छत्तीसगढ़ की संस्कृति का अद्वितीय खजाना समेटे हुए है, जिसमें लोक कला से लेकर आदिवासी वाद्य यंत्र तक सब कुछ देखने को मिलता है।

संग्रहालय का महत्व: महंत घासीदास संग्रहालय छत्तीसगढ़ की कला, संस्कृति और लोक जीवन का एक अद्भुत संग्रह है। यहां संग्रहित वस्तुएं न केवल राज्य की ऐतिहासिक धरोहर को दर्शाती हैं, बल्कि यह छत्तीसगढ़ की सांस्कृतिक पहचान को भी उजागर करती हैं। इस संग्रहालय में छत्तीसगढ़ के आदिवासी जीवन, उनके रीति-रिवाज, परंपराएं और उनकी कला को प्रदर्शित किया गया है।
विषयवार संग्रह:
- लोक कला और संस्कृति: महंत घासीदास संग्रहालय में छत्तीसगढ़ की लोक कला और संस्कृति का अद्भुत संग्रह है। यहां विभिन्न पारंपरिक वाद्ययंत्रों, काष्ठकला, माटी की मूर्तियों और लोक चित्रकला के नमूने प्रदर्शित किए गए हैं।
- प्राचीन वाद्ययंत्र: संग्रहालय में बहुत से पुराने और पारंपरिक वाद्ययंत्रों का संग्रह किया गया है, जिनका उपयोग आदिवासी समुदायों द्वारा शिकार करने, पूजा-अर्चना और अन्य सांस्कृतिक गतिविधियों में किया जाता था। इनमें प्रमुख रूप से सिंह बाजा, गोपी बाजा, तंबूरा, नागदा, मारनी ढोल, माड़िया ढोल, एकतारा, खजेरी, तोड़ी, मोहिर, देव नागदा, मिरगीर ढोल और मांदरी आदि शामिल हैं। इनमें से अधिकांश वाद्ययंत्र आज लुप्त हो चुके हैं या कम इस्तेमाल होते हैं।
- पुरातात्विक वस्तुएं: संग्रहालय में पुरातात्विक वस्तुएं जैसे 15वीं शताब्दी के सिक्के, मूर्तियां, पुराने आभूषण, और ब्रिटिश काल के सिक्के भी प्रदर्शित किए गए हैं। ये वस्तुएं छत्तीसगढ़ की ऐतिहासिक धरोहर और सभ्यता का प्रमाण हैं।
- प्राकृतिक और आदिवासी जीवन: संग्रहालय में आदिवासी जीवन और उनके प्राकृतिक संसाधनों का चित्रण किया गया है। यहां आदिवासियों के शिकार और दिनचर्या को दर्शाने वाले उपकरण और वस्तुएं प्रदर्शित की गई हैं। इस संग्रहालय में आदिवासी समुदायों द्वारा इस्तेमाल की जाने वाली अनूठी चीजें, उनके धार्मिक विश्वास और जीवनशैली के बारे में भी जानकारी मिलती है।
संग्रहालय की स्थापना: महंत घासीदास संग्रहालय की स्थापना 1875 में राजनांदगांव के महाराजा महंत घासीदास ने की थी। यह संग्रहालय छत्तीसगढ़ के सांस्कृतिक, ऐतिहासिक और पुरातात्विक महत्व को उजागर करने वाला पहला संग्रहालय था। इसे छत्तीसगढ़ राज्य के सबसे पुराने संग्रहालयों में गिना जाता है।
वर्तमान में संग्रहालय: आज भी यह संग्रहालय छत्तीसगढ़ के इतिहास, कला और संस्कृति को जीवित रखने का एक महत्वपूर्ण केंद्र बना हुआ है। यहां आगंतुकों को राज्य की समृद्ध सांस्कृतिक धरोहर से परिचित होने का मौका मिलता है। यह संग्रहालय न केवल शोधकर्ताओं और इतिहासकारों के लिए, बल्कि आम जनता के लिए भी एक महत्वपूर्ण स्थल है, जहां वे छत्तीसगढ़ के इतिहास और संस्कृति को बेहतर तरीके से समझ सकते हैं।

विलुप्त होते वाद्य यंत्र
संग्रहालय में रखे गए वाद्य यंत्रों में से कई ऐसे हैं जिनका उपयोग पहले शिकार के लिए या जंगलों में जानवरों को भगाने के लिए किया जाता था। इनमें से कुछ प्रमुख वाद्य यंत्र हैं – सिंह बाजा, दोहरी बांसुरी, गोपी बाजा, एकतारा, खजेरी, तंबूरा, नागदा, मारनी ढोल, माड़िया ढोल, अकुम, तोड़ी, तोरम, मोहिर, धुरवा ढोल, मांदरी, चरहे, मिरगीर ढोल, और देव मोहिर। इनमें से अधिकांश वाद्य यंत्र ऐसे हैं जिनका नाम भी लोग शायद ही जानते होंगे।
शिकार के लिए वाद्य यंत्रों का उपयोग
पुराने समय में, आदिवासी वाद्य यंत्रों का इस्तेमाल शिकार के दौरान जानवरों को आकर्षित करने या उन्हें भगाने के लिए किया जाता था। बांसुरी, नगाड़े और अन्य वाद्य यंत्रों की ध्वनि से जंगली जानवरों को शिकार की ओर आकर्षित किया जाता था, या फिर उन्हें भगाने के लिए इनका इस्तेमाल होता था। यही ध्वनियां बाद में संगीत के रूप में विकसित हो गईं और आज भी हम इन ध्वनियों को सुनते हैं।

संग्रहालय का महत्व
महंत घासीदास संग्रहालय सिर्फ वाद्य यंत्रों के लिए ही नहीं, बल्कि छत्तीसगढ़ की संस्कृति और इतिहास के लिए भी महत्वपूर्ण है। यहां 15वीं शताब्दी के आभूषण, मूर्तियां, सिक्के और राजा-महाराजाओं के समय में इस्तेमाल की जाने वाली तलवारें भी रखी गई हैं। संग्रहालय में कुल मिलाकर 15,000 से अधिक ऐतिहासिक वस्तुएं मौजूद हैं, जिनमें पांडुलिपियां, आदिवासी कलाकृतियां और प्राचीन सिक्के शामिल हैं।

छत्तीसगढ़ की सांस्कृतिक धरोहर का संरक्षण
वर्तमान में, छत्तीसगढ़ संस्कृति विभाग और कुछ संगीत प्रेमी इन विलुप्त होते वाद्य यंत्रों को सहेजने का कार्य कर रहे हैं। इन वाद्य यंत्रों को रायपुर के महंत घासीदास संग्रहालय में सुरक्षित रखा गया है, ताकि आने वाली पीढ़ियां इनका महत्व समझ सकें और छत्तीसगढ़ की समृद्ध सांस्कृतिक धरोहर को जान सकें।

महंत घासीदास संग्रहालय न केवल छत्तीसगढ़ की संस्कृति का गवाह है, बल्कि यह हमारे इतिहास और संगीत के प्रति सम्मान और संरक्षण की आवश्यकता को भी उजागर करता है।
महंत घासीदास संग्रहालय छत्तीसगढ़ की समृद्ध सांस्कृतिक धरोहर का एक अनमोल खजाना है। यहां संग्रहित वस्तुएं और वाद्ययंत्र छत्तीसगढ़ की पुरानी परंपराओं और जीवनशैली का अद्भुत चित्रण करते हैं। यह संग्रहालय न केवल छत्तीसगढ़ के लोगों के लिए, बल्कि देश और दुनिया भर से आने वाले पर्यटकों के लिए भी आकर्षण का केंद्र है।