महाराष्ट्र के कोल्हापुर में स्थित श्री महालक्ष्मी (अंबाबाई) मंदिर सदियों पुरानी आस्था का केंद्र है। मान्यता है कि इसका मूल निर्माण 7वीं शताब्दी में चालुक्य राजाओं ने कराया, जिसे बाद में शिलाहार और मराठा शासकों ने संरक्षित और विकसित किया।
यह मंदिर प्रमुख शक्तिपीठों में शामिल है। पौराणिक कथा के अनुसार, यहाँ देवी सती के तीन नेत्र गिरे थे। साथ ही, देवी द्वारा राक्षस कोलासुर के वध के बाद इस स्थान का नाम कोल्हापुर पड़ा।
गर्भगृह में स्थापित लगभग 3 फीट ऊँची काले पत्थर की देवी महालक्ष्मी की प्रतिमा अत्यंत आकर्षक है। देवी की चार भुजाएँ हैं, जिनमें नींबू, गदा, ढाल और पानपात्र सुशोभित हैं। प्रतिमा के पीछे सिंह की आकृति है और मुकुट पर शेषनाग का चिन्ह अंकित है। रत्नजड़ित मुकुट का वजन लगभग 40 किलो बताया जाता है।
मंदिर की सबसे अनोखी विशेषता इसका पश्चिममुखी होना है। वर्ष में विशेष दिनों पर डूबते सूर्य की किरणें सीधे देवी के चरणों से होते हुए मुखमंडल को आलोकित करती हैं। इस दृश्य को ‘किरणोत्सव’ कहा जाता है।
नवरात्रि और किरणोत्सव के दौरान यहाँ हजारों श्रद्धालु दर्शन के लिए पहुँचते हैं। हेमाडपंती शैली में निर्मित काले पत्थर की नक्काशीदार संरचना और भव्य मंडप इसे स्थापत्य की दृष्टि से भी अद्वितीय बनाते हैं।
आस्था, इतिहास, पौराणिक मान्यता और खगोलीय ज्ञान का संगम, कोल्हापुर का महालक्ष्मी मंदिर आज भी श्रद्धालुओं और पर्यटकों के लिए प्रमुख आकर्षण बना हुआ है।
