महासमुंद जिले के सिरपुर में स्थित लक्ष्मण मंदिर भारतीय प्राचीन स्थापत्य, इंजीनियरिंग कौशल और सांस्कृतिक समन्वय का अद्वितीय उदाहरण है। लगभग 7वीं शताब्दी (625–650 ई.) में निर्मित यह मंदिर देश के सबसे प्राचीन लाल ईंटों से बने मंदिरों में गिना जाता है। इसकी सबसे बड़ी विशेषता यह है कि ईंटों को जोड़ने के लिए सीमेंट का नहीं, बल्कि उड़द दाल, गुड़, बबूल का गोंद, चुना और जड़ी-बूटियों से बने पारंपरिक मिश्रण का उपयोग किया गया था।
लक्ष्मण मंदिर नागर शैली में निर्मित है। मंदिर के सामने 16 स्तंभों वाला मंडप, उसके बाद अंतराल और गर्भगृह इसकी पारंपरिक संरचना को दर्शाते हैं। प्रवेश द्वार पर भगवान विष्णु के विभिन्न अवतारों की बारीक नक्काशी की गई है। ईंटों पर हाथी, सिंह और अन्य आकृतियों की कलात्मक कारीगरी इसे स्थापत्य की दृष्टि से अत्यंत विशिष्ट बनाती है।
इतिहास के अनुसार, प्राचीन समय में सिरपुर (श्रीपुर) दक्षिण कौशल की राजधानी था। उस समय यहां शैव राजाओं का शासन था। सोमवंशी राजा हर्षगुप्त के निधन के बाद उनकी पत्नी वसाटा देवी, जो वैष्णव आस्था से जुड़ी थीं, ने अपने पति की स्मृति में इस विष्णु समर्पित मंदिर का निर्माण कराया। यही कारण है कि इस मंदिर को प्रेम और श्रद्धा का प्रतीक भी माना जाता है।
11वीं–12वीं शताब्दी में आए भूकंप और 14वीं शताब्दी में महानदी की भीषण बाढ़ के बावजूद यह मंदिर आज भी मजबूती से खड़ा है। मंदिर परिसर में बना अंडाकार प्राचीन कुआं, जिसका ऊपरी भाग चौड़ा और निचला भाग संकरा है, भूकंपरोधी संरचना का उदाहरण माना जाता है। खुदाई में मंदिर के नीचे पत्थरों का फर्श भी मिला है, जो इसकी मजबूत नींव को दर्शाता है।
सिरपुर क्षेत्र को तीन धर्मों—हिंदू, बौद्ध और जैन—का संगम माना जाता है। आसपास के क्षेत्र में अनेक शिव मंदिर, बौद्ध विहार, विष्णु मंदिर और जैन विहार के अवशेष मिले हैं। मंदिर परिसर में स्थापित संग्रहालयों में 6वीं से 9वीं शताब्दी की दुर्लभ मूर्तियां सुरक्षित रखी गई हैं।
रायपुर से लगभग 80 किलोमीटर दूर स्थित यह ऐतिहासिक स्थल न केवल छत्तीसगढ़, बल्कि पूरे देश के लिए गौरव का विषय है। लक्ष्मण मंदिर प्राचीन भारतीय कला, विज्ञान और सांस्कृतिक विरासत का जीवंत प्रमाण है, जो आज भी पर्यटकों और शोधकर्ताओं को आकर्षित करता है।
