लेमनग्रास की खेती छोटे किसानों के लिए आय का सशक्त साधन बनकर उभर रही है। कम लागत, अधिक मुनाफा और बंजर भूमि पर भी सफल उत्पादन की क्षमता के कारण यह फसल किसानों की आर्थिक स्थिति मजबूत कर रही है। लेमनग्रास की खासियत यह है कि यह कीटों और जंगली जानवरों से सुरक्षित रहती है तथा एक बार रोपण के बाद कई वर्षों तक निरंतर उत्पादन देती है। इससे प्राप्त तेल की बाजार में अच्छी मांग है, जिसका उपयोग साबुन, परफ्यूम एवं हर्बल उत्पादों के निर्माण में किया जाता है।
गौरेला–पेण्ड्रा–मरवाही जिला वनों से घिरा हुआ क्षेत्र है, जहां अधिकांश किसानों के पास सीमित खेती योग्य भूमि उपलब्ध है। कई किसानों के पास एक एकड़ से भी कम भूमि है, जिसके चलते वे आजीविका के लिए मजदूरी या बड़े शहरों की ओर पलायन करने को मजबूर थे।
किसानों की इस स्थिति को देखते हुए छत्तीसगढ़ आदिवासी, स्थानीय स्वास्थ्य परंपरा एवं औषधि पादप बोर्ड द्वारा औषधीय एवं सुगंधित पौधों की खेती को बढ़ावा दिया जा रहा है। इसी क्रम में लेमनग्रास की खेती को योजनाबद्ध तरीके से किसानों की आय बढ़ाने के उद्देश्य से शुरू किया गया है।
230 एकड़ में हो रही है लेमनग्रास की खेती
बोर्ड द्वारा क्लस्टर मॉडल के माध्यम से किसानों को समूहों में जोड़ा गया। लेमनग्रास की बुवाई से पहले ही किसानों का तेल क्रय करने वाले उद्योगों से अनुबंध कराया गया। इन उद्योगों द्वारा बोरवेल, खेत की जुताई, पौधारोपण, फेंसिंग सहित अन्य आवश्यक कार्यों के लिए अग्रिम वित्तीय सहायता उपलब्ध कराई गई। किसान फसल विक्रय के बाद यह राशि चरणबद्ध तरीके से वापस करते हैं।
इसके साथ ही बोर्ड द्वारा लेमनग्रास की स्लिप्स निःशुल्क उपलब्ध कराई गईं तथा तेल निष्कर्षण के लिए आसवन संयंत्र (डिस्टिलेशन यूनिट) भी स्थापित किए गए हैं। भविष्य में प्रत्येक 50 किसानों पर एक आसवन संयंत्र स्थापित करने की योजना है। वर्तमान में जिले के चार क्लस्टरों—खरड़ी, पंडरी, अमारू एवं हरड़ी—के 123 किसान लगभग 230 एकड़ भूमि में लेमनग्रास की खेती कर रहे हैं।
एक बार रोपण, कई वर्षों तक उत्पादन

ग्राम बहरी–जोरकी के किसान अगहन सिंह के पास केवल 35 डिसमिल (लगभग एक-तिहाई एकड़) भूमि थी, जिससे उनकी आय सीमित थी। बोर्ड से प्रेरित होकर उन्होंने लेमनग्रास की खेती शुरू की। उन्हें निःशुल्क स्लिप्स प्रदान की गईं। लेमनग्रास की फसल चार माह में तैयार हो जाती है। पहली कटाई में लगभग चार लीटर तेल प्राप्त होता है, जिसका बाजार मूल्य 1000 रुपये प्रति लीटर के अनुसार 4,000 रुपये है। दूसरी कटाई में आठ लीटर तेल प्राप्त होता है, जिससे 8,000 रुपये की आय होती है। इस प्रकार एक वर्ष में कुल 12,000 रुपये की आय होती है, जो अगले पांच वर्षों तक निरंतर प्राप्त होती रहती है।
आत्मनिर्भर बन रहे किसान
अगहन सिंह जैसे अनेक किसान आज लेमनग्रास की खेती से आत्मनिर्भर बन रहे हैं। इस मॉडल की विशेषता यह है कि किसान शून्य बजट में खेती प्रारंभ कर सकते हैं और उन्हें अल्प समय में आय मिलने लगती है।
लेमनग्रास की खेती से किसानों की आय में वृद्धि, स्थानीय स्तर पर रोजगार के अवसर, पलायन में कमी और छोटे किसानों की आर्थिक मजबूती जैसे सकारात्मक परिवर्तन सामने आ रहे हैं। गौरेला–पेण्ड्रा–मरवाही जिले में लेमनग्रास की खेती छोटे किसानों के लिए वास्तव में एक वरदान बनकर उभर रही है।
