रायपुर साहित्य उत्सव में विनोद कुमार शुक्ल और उनके साहित्य का स्मरण
‘स्मृति शेष विनोद कुमार शुक्ल : साहित्य की खिड़कियां’ विषय पर हुई परिचर्चा
छत्तीसगढ़ ने बीते 200 वर्षों में हिंदी साहित्य को बार-बार नई दिशा दी, इनमें विनोद कुमार शुक्ल भी शामिल : डॉ. सुशील कुमार त्रिवेदी
नवा रायपुर स्थित पुरखौती मुक्तांगन में जनसंपर्क विभाग द्वारा आयोजित रायपुर साहित्य उत्सव के पहले दिन देश के शीर्षस्थ साहित्यकार स्वर्गीय विनोद कुमार शुक्ल और उनके साहित्य का भावपूर्ण स्मरण किया गया।
‘स्मृति शेष विनोद कुमार शुक्ल : साहित्य की खिड़कियां’ विषय पर आयोजित परिचर्चा में साहित्य, प्रशासन, पत्रकारिता और फिल्म जगत से जुड़े वक्ताओं ने उनके व्यक्तित्व और कृतित्व पर विचार रखे। वक्ताओं ने उनके साहित्य को मानवीय संवेदना और मौलिक अभिव्यक्ति का अद्वितीय उदाहरण बताया।
परिचर्चा के प्रथम वक्ता सेवानिवृत्त आईएएस अधिकारी एवं साहित्यकार डॉ. सुशील कुमार त्रिवेदी ने कहा कि वे वर्ष 1973 से लगातार विनोद कुमार शुक्ल से जुड़े रहे हैं। उन्होंने कहा कि छत्तीसगढ़ ने बीते 200 वर्षों में हिंदी साहित्य को बार-बार नई दिशा दी है। ठाकुर जगमोहन सिंह, माधवराव सप्रे, पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी, मुकुटधर पांडेय से लेकर विनोद कुमार शुक्ल तक की परंपरा ने हिंदी साहित्य को समृद्ध किया है।
डॉ. त्रिवेदी ने कहा कि विनोद कुमार शुक्ल ने किसी विचारधारा या कवि का अनुगमन नहीं किया, उनका संपूर्ण लेखन मौलिक है। उनकी रचनाओं में साधारण मनुष्य पूरी गरिमा और संवेदना के साथ उपस्थित होता है। शोषितों का जीवन, स्वयं गढ़े हुए मुहावरे, सरल भाषा और गहरी अनुभूति उनके साहित्य की पहचान है। उनके उपन्यासों में ‘घर’ एक सुंदर और मानवीय प्रतीक के रूप में उभरता है।
नई दिल्ली की युवा कथाकार एवं पत्रकार आकांक्षा पारे ने कहा कि कई लोग विनोद कुमार शुक्ल की रचनाओं को दुरूह बताकर खारिज कर देते हैं, जबकि अनेक पाठकों को उनसे गहरा और आत्मीय जुड़ाव महसूस होता है। उन्होंने कहा कि उनका साहित्य मनुष्य को मनुष्य से जोड़ता है।
जनसंपर्क विभाग के उप संचालक एवं युवा साहित्यकार सौरभ शर्मा ने कहा कि विनोद कुमार शुक्ल का साहित्य यह सिखाता है कि सामान्य जीवन जीते हुए भी मनुष्य खुश रह सकता है। वे बड़े लेखक होने के साथ-साथ एक अत्यंत संवेदनशील इंसान भी थे। उन्होंने बताया कि ‘स्मृति’ का प्रयोग उनके साहित्य में विशेष रूप से दिखाई देता है, जो पाठकों में कौतुक और जिज्ञासा उत्पन्न करता है।
राज्य प्रशासनिक सेवा के अधिकारी एवं लेखक अनुभव शर्मा ने कहा कि विनोद कुमार शुक्ल को पढ़ने के बाद उन्होंने उनके साहित्य को जिया है। उनकी रचनाओं में आए प्रतीक और बिंब हमारे आसपास के जीवन से जुड़े होते हैं। ‘पेड़ों का हरहराना, चिड़ियों का चहचहाना’ जैसे छोटे-छोटे प्रतीक उनकी रचनाओं में सहज रूप से मिलते हैं। उनकी कथाएं हमारी मिट्टी से उपजे शब्दों में अपनी बात कहती हैं और परत-दर-परत खुलती जाती हैं।
अभिनेत्री टी.जे. भानु ने अपने अनुभव साझा करते हुए कहा कि साहित्य उन्हें बचपन से संबल देता रहा है। उन्होंने बताया कि जब उन्होंने पहली बार विनोद कुमार शुक्ल की कविता पढ़ी, तो लगा कि यही वे बातें हैं, जिन्हें वे स्वयं कहना चाहती थीं। उन्होंने कहा कि वे हर वर्ष 1 जनवरी को उनके जन्मदिन पर रायपुर आकर उनसे मिलती थीं। उनकी किताबों में जनमानस की सच्ची और आत्मीय अनुभूतियां समाहित हैं।
परिचर्चा की सूत्रधार डॉ. नीलम वर्मा ने समापन करते हुए कहा कि विनोद कुमार शुक्ल के साहित्य की एक नहीं, अनेक खिड़कियां हैं। उनके लेखन में गहरी मानवीय करुणा और संवेदना समाई हुई है। वे किसी एक राज्य या देश तक सीमित नहीं हैं, बल्कि उनकी रचनाएं पूरी दुनिया को जोड़ती हैं।
