आज की वैश्विक राजनीति संतुलन, रणनीति और भरोसे पर टिकी है। यही कारण है कि जब नाटो जैसा शक्तिशाली सैन्य संगठन अपने 76 वर्षों के इतिहास के सबसे बड़े संकट से गुजर रहा है, तो कई देशों की नजरें भारत की ओर टिक गई हैं। यह कोई संयोग नहीं, बल्कि भारत की बढ़ती वैश्विक कूटनीतिक ताकत का संकेत माना जा रहा है।
पिछले कुछ दिनों में नाटो जिस संकट में फंसा है, उसकी वजह कोई दुश्मन देश नहीं, बल्कि खुद अमेरिका और पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप बताए जा रहे हैं। ग्रीनलैंड को लेकर ट्रंप की आक्रामक बयानबाजी और संभावित सैन्य कार्रवाई की धमकी ने नाटो के भीतर ही तनाव पैदा कर दिया है। इसी बीच डेनमार्क ने भारत से इस मुद्दे पर हस्तक्षेप और संतुलित भूमिका निभाने की अपील की है।
ग्रीनलैंड विवाद: डेनमार्क हाई अलर्ट पर
डेनमार्क सरकार अमेरिका की सैन्य कार्रवाई की धमकी को गंभीरता से ले रही है। प्रधानमंत्री मेटे फ्रेडरिक्सन के नेतृत्व वाली सरकार ने साफ चेतावनी दी है कि यदि अमेरिकी सैनिक ग्रीनलैंड में प्रवेश करते हैं, तो डेनिश सेना को पहले गोली चलाने और बाद में सवाल पूछने का आदेश है। यह आदेश वर्ष 1952 के एक सैन्य निर्देश के तहत आता है, जो अब भी प्रभावी है।
डेनमार्क के रक्षा मंत्री ने यह भी ऐलान किया है कि ग्रीनलैंड को दोबारा हथियारबंद करने के लिए 13.8 अरब डॉलर खर्च किए जाएंगे। हालांकि, विशेषज्ञों का मानना है कि डेनमार्क की सीमित सैन्य क्षमता अमेरिका जैसी महाशक्ति के सामने बेहद कमजोर है।
सैन्य ताकत का अंतर
ग्लोबल फायरपावर रैंकिंग के अनुसार अमेरिका सैन्य शक्ति में पहले स्थान पर है, जबकि डेनमार्क 45वें स्थान पर।
- अमेरिका के पास लगभग 13 लाख सक्रिय सैन्यकर्मी हैं
- डेनमार्क के पास कुल मिलाकर करीब 17,300 सैनिक हैं
डेनिश थलसेना में लगभग 8,000 जवान, नौसेना में 3,500 और वायुसेना में करीब 3,000 कर्मी हैं। डेनमार्क के पास कोई पनडुब्बी नहीं है और उसकी वायु शक्ति भी सीमित मानी जाती है। ग्रीनलैंड की भौगोलिक दूरी (डेनमार्क से लगभग 3,000 किमी) भी उसके लिए बड़ी चुनौती है।
भारत से क्यों उम्मीद?
डेनमार्क के राजदूत ने भारत से अपील की है कि वह इस विवाद में शांतिपूर्ण समाधान की दिशा में भूमिका निभाए। भारत के अमेरिका के साथ मजबूत रक्षा, तकनीकी और व्यापारिक संबंध हैं, ऐसे में भारत के लिए सीधा टकराव संभव नहीं माना जा रहा। विशेषज्ञों के अनुसार भारत संभवतः संवाद, कूटनीति और अंतरराष्ट्रीय कानून की बात करेगा—और यही उसकी सबसे बड़ी ताकत है।
डेनमार्क की प्रधानमंत्री ने भी स्पष्ट कर दिया है कि अगर कोई अमेरिकी सैनिक उनकी जमीन पर उतरा तो डेनिश सेना बिना किसी पूर्व अनुमति के जवाबी कार्रवाई करेगी।
संघर्ष की स्थिति में क्या होगा?
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि अमेरिका और डेनमार्क के बीच सैन्य टकराव होता है, तो यह संघर्ष बहुत कम समय में समाप्त हो सकता है। नाटो के पूर्व वरिष्ठ अधिकारी जेमी शी के अनुसार, नाटो की ओर से अमेरिका के खिलाफ किसी सैन्य कार्रवाई की संभावना लगभग नहीं के बराबर है, क्योंकि अमेरिका की सैन्य क्षमता यूरोपीय देशों से कहीं अधिक है।
निष्कर्ष:
ग्रीनलैंड विवाद ने नाटो की एकता पर सवाल खड़े कर दिए हैं। इस संकट के बीच भारत का नाम सामने आना दर्शाता है कि वैश्विक मंच पर भारत अब केवल एक उभरती शक्ति नहीं, बल्कि विश्वसनीय संतुलनकर्ता के रूप में देखा जाने लगा है।
